जनमंच

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अनिल अनूप

जनमंच के व्यवहार में हिमाचल सरकार की नई पेशकश, भले ही सीमित परिदृश्य में जनता के मसलों से रू-ब-रू हुई हो, लेकिन सत्ता की अवधारणा में मंत्रियों की भूमिका अवश्य बदली हुई नजर आई। कमोबेश हर मंत्री अपने सत्ता केंद्र से दूर, अलग जिला और भिन्न विधानसभा क्षेत्र में जाकर यह महसूस कर सकता है कि सारे प्रदेश का दर्द क्या है। यह एक तरह से विभागीय पड़ताल का भी अवसर है, लेकिन एक दिन का मंच केवल दिल को छूने भर का इंतजाम है। करीब चार हजार मसले अगर एक दिन में मात्र बारह स्थानों पर एकत्रित हो रहे हैं, तो इस तरह बड़ी तस्वीर का अवलोकन कई इशारे कर रहा है। दूसरे अर्थों में यह अनुमान लगाया जा सकता है कि किस तरह निचले स्तर तक पहुंचने से पहले योजनाएं व कार्यक्रम फिसल जाते हैं। बहरहाल जो शिकायतें सामने आईं, वे इस काबिल तो हैं कि पता लगाया जा सके कि कौन-कौन से विभाग असफल रहे हैं या जनापेक्षाओं के सामने सरकारी कार्यसंस्कृति कितनी असंवेदनशील मानी जाएगी। जनमंच तक पहुंची शिकायतों में पानी, सड़क और बिजली आपूर्ति से आजिज जनता का एक छोटा सा वर्ग अगर किसी छोर पर अकेला खड़ा मिल रहा है, तो भी सरकारी समाधानों की स्थिति में यह अस्वीकार्य होना चाहिए। बेशक जनमंच के आयोजन को एक सुखद पहल मान लें, फिर भी जगह चुनने के सूत्रधार गोपनीय हैं। यानी एक महीने बाद किस विधानसभा क्षेत्र का कौन सा गांव ऐसे आयोजन का केंद्र बनेगा, इसकी कोई स्पष्ट पद्धति फिलहाल दिखाई नहीं देती। अगर चयन का आधार वैज्ञानिक व पारदर्शी होगा, तो जनमंच की विश्वसनीयता और मजबूती से दर्ज होगी,  वरना इसकी सफलता के बीच कई अर्थ पढ़े जाएंगे। मूलता प्रश्न तो सरकार व जनता के बीच सीधे संवाद को लेकर हमेशा से रहा है और अगर जनमंच इसका जरिया बनता है, तो यह कदम अपने लक्ष्य का निर्धारण कर सकता है। पहले जनमंच में जो लाभान्वित हुए, उन्हें दफ्तरों की जद्दोजहद से छुटकारा मिल गया, लेकिन इससे कार्यसंस्कृति की गंदी पपडि़यां नहीं उतरीं। हम जनमंच के माध्यम से संदेश दे सकते हैं, लेकिन सुशासन के पहरेदार के रूप में हर कार्यालय तक अलर्ट जगाने की आवश्यकता है। कार्यप्रणाली में जवाबदेही जब तक तय नहीं होगी या पारदर्शी तरीके से सरकारी योजनाओं के लाभ नहीं मिलेंगे, जनमंच की सदाशयता पूरी तरह राहत नहीं बांट पाएगी। सरकार से कड़े संदेशों को प्रतीक्षारत जनता यह भी चाहती है कि दफ्तरों में सौहार्द का वातावरण बने। एक परंपरा सी हिमाचल में बन चुकी है और जिसके दायरे में सरकारी कामकाज केवल एक प्रदर्शन सरीखा है, यानी महकमे अपने फर्ज की कीमत केवल सियासी मंशा से तोलते हैं। आम रूटीन में अगर काम की परंपराएं सशक्त नहीं होंगी, तो कहां-कहां मंच गठित करके राहत मिलेगी। खास तौर पर शिक्षा-चिकित्सा क्षेत्र से अगर शिकायतें हैं, तो इन्हें दूर करने के उपायों के बजाय काम करने के तरीके बदलने की जरूरत कहीं अधिक है। शिक्षक की चयन पद्धतियों ने ऐसा संसार रच दिया, जहां काबिलीयत पर संदेह है या कर्मठता के बजाय शिक्षण के माहौल में नकल के पोषक पैदा हो गए। अतः जनमंच के वास्तविक लक्ष्यों में यह सुनिश्चित होना चाहिए कि विभागीय कार्यप्रणाली पूर्ण रूपेण प्रतिबद्ध हो। सरकारी कार्य की गारंटी का ताल्लुक दफ्तरी माहौल की कुशलता से संबंध रखता है। जब तक स्थानांतरण के पैबंद नहीं उतरेंगे या ईमानदार कर्मचारी के साथ व्यवस्था खड़ी नहीं होगी, शिकायतों का वास्तविक निपटारा नहीं होगा। बहरहाल जनमंच के माध्यम से सत्ता का संवाद सशक्त होगा और मंत्रियों के प्रदर्शन में पहली बार यह व्यवस्था जुड़ रही है कि कम से कम महीने में एक बार उन्हें राजधानी व अपने चुनाव क्षेत्र से बाहर निकल कर अन्य क्षेत्रों की जनता की परेशानी से रू-ब-रू होना ही पड़ेगा।

Anil Anup

Anil Anup

राज्य ब्यूरो प्रभारी पंजाब, हिमाचल, हरियाणा और जम्मू-कश्मीर l

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