मैं खाकी हूँ, थक गयी हूँ अब दौड़ते भागते..

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रितुराज राजावत -: इंडियन पैनल कोड 1861 की जंजीरों से आज भी बंधे हुए हैं देश के पुलिसकर्मी सुविधा सहूलियत के बगैर वर्षों पुरानी पटरी पर दौड़ रही है पुलिस की रेलगाड़ी
होली दीवाली तीज त्योहार से टूट चुका है पुलिस का नाता छुट्टी ना मिलने के कारण पुलिसकर्मी चाह कर भी नही दे पातें हैं बूढ़े माँ बाप को अपने कंधों का आखिरी सहारा
चौबीसों घण्टे की थकान भरी नोकरी साफ आती है चेहरे पर नजर बाउजूद इसके कोई भी कभी भी पहना जाता है लापरवाह होने का ताज

सत्ताधारियों की आव भगत न करने पर मिलता है ट्रांसफर रूपी प्रमोशन कुर्ते की सफेदी के समक्ष अमूमन कमजोर दिखती है खाकी
सरकारी कमरों की छतों से बेपनाह टपकता है बरसात का पानी सुख सुविधा के आभाव में फिर भी वर्दी निष्पक्षता से करती है अपने कर्तव्यों का निर्वाहन
वर्षों पुरानी चौपहिया से तेज रफ्तार अपराधियों को पकड़ने का दिया जाता है निर्देश आपात की स्थिति में अमूमन सरकारी वाहन छोड़ देतें हैं साथ
मैं खाकी हूँ । मैं सुरक्षा करती हूँ देश के संविधान की इस भारतवर्ष की जनता की । फरियादी को न्याय और गुनहगार को सजा दिलाना यही मेरा कर्तव्य है और यही मेरा उद्देश्य ।मेरे कड़क रवैये से अमूमन अपराधियों के हौसले पस्त हो जातें है । पर अब वो बात मुझमे नही रही थोड़ी कमजोर जो पड़ चुकीं हूँ मैं । सफेद कुर्ता धारियों द्वारा फैलाए गए भृष्टाचार जैसे कैंसर ने आजकल मुझे जकड़ लिया है। ईमानदारी की सजा अब मुझे प्रतिदिन दी और दिलाई जाती है । मेरी वर्दी से रसता हुआ लहू आज भी इस बात की गवाही सीना तान कर देने के लिए काफी है कि ईमानदारी की सजा मुझे कितने गहरे जख्म रोज दे जाती है। काफी कोशिश कर चुकीं हूँ अपने रस्ते हुए घाव को भरने की पर क्या करूं उपचार के नाम पर कोई आश्वासन का मरहम भी तो नही देना चाहता । टपकते खून से बने मेरे पैरों के निशान कभी इस थाने में दिख जातें हैं तो कभी उस थाने में। बेदम और बोझल शरीर लिए बस चलती जा रहीं हूँ मैं । असुरक्षा की भावना मेरे जेहन में हमेशा कैद रहती है डर सिर्फ इस बात का बना रहता है कि जख्म कहीं नासूर न बन जाएं । मेरे चेहरे पर थकान के बादल हमेशा की तरह आज भी छाए रहतें हैं । अपने परिवार को अंतिम समय में कंधा भले नही दे सकी मैं पर अपने कर्तव्यों के भार को आज भी निश्वार्थ अपने कंधों पर सजाए हुए हूँ मैं । आरोपों के ताज से अब रोज मुझे नवाजा जाता है पर मुश्कुरा कर बर्दाश्त करने की आदत डाल चुकी हूं मैं । जिंदगी आज भी रफ्तार से चलने को मजबूर करती है पर क्या करूं थक गयी हूँ मै अब दौड़ते भागते

Prem

Prem

Sud-Editor

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