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अनिल अनूप
भारतीय सिनेमा का इतिहास विश्व सिनेमा के लगभग समकक्ष है। सन् 1896 में मूक सिनेमा के द्वारा घुटने के बल चलने से लेकर सन् 1930 में सवाक् सिनेमा के द्वारा अपने पैरों पर खड़े होने की कोशिश सराहनीय है। पचास के दशक में बंगाल ने भारतीय सिनेमा की भाषा को विस्तार दिया। ‘पाथेर पांचाली ‘ नायिका प्रधान फिल्म थी। मुंबई में कुछ नए फ़िल्मकारों ने तथाकथित ‘नई धारा’ का सिनेमा बनाया। पचास और साठ के दशक में हिंदी सिनेमा में अनेक अच्छी अभिनेत्रियाँ हुईं। वहीदा रहमान, नूतन सरीखी अभिनेत्रियों ने अपने समय में, अपनी सीमाओं के भीतर अच्छा और अर्थपूर्ण काम किया। सत्तर के दशक में हिंदी सिनेमा में अभिनेत्रियों को ऐसे अनेक अवसर मिले जो स्त्री की बदलती छवि के साथ न्याय करते हों। इसी दशक में शबाना आज़मी, जया भादुड़ी, स्मिता पाटिल व रेखा सरीखी अभिनेत्रियाँ उभरीं और फिल्म को नए आयाम दिए। संभवत: यह सत्यजित रे की उक्ति है : “अच्छी अभिनेत्री वह है जो भले ही फिल्म के हर फ्रेम में मौज़ूद न हो, लेकिन हर जगह उसकी याद आपको आती रहे।”
कुछ अभिनेत्रियाँ चेहरे और शारीरिक सौष्ठव के कारण सिनेमा की दुनिया के जादू का केंद्रीय आकर्षण बनी रहीं, किंतु शबाना, स्मिता की पीढ़ी निरंतर प्रयास और मेहनत के बाद अपने चेहरे को स्थापित कर पाई। रेखा की ‘उमराव जान’, ‘कलियुग ‘ सरीखी फिल्में समाज को उसके यथार्थ का एक हिस्सा दर्शाने में सफल रहीं। रेखा और राखी जैसी अभिनेत्रियों को फिल्मों में बाज़ार मिला। शबाना ‘अंकुर ‘और ‘खंडहर’ से शुरू होकर ‘अवतार ‘ और ‘दूसरी दुल्हन’ में सफलतापूर्वक फिट हुई। ‘भूमिका ‘, चक्र ‘, बाज़ार ‘और ‘सुबह’ जैसी फिल्मों में स्मिता ने नारी के विविध, किंतु सशक्त व्यक्तित्व को उभारा है। ‘सुबह’ में स्मिता ने अभिनय के विस्तृत क्षेत्र को सिद्ध किया। हैदराबाद के मुस्लिम वातावरण को आधार बनाने वाली इस फिल्म में स्मिता ने एक नया यथार्थ प्रस्तुत किया।
स्वतंत्रता –प्राप्ति के लगभग पाँच दशक बाद भी आम भारतीय के, नारी संबंधी दृष्टिकोण में अंतर नहीं आ पाया। पुरूष –प्रधान दृष्टिकोण हर क्षेत्र में व्याप्त और विजयी है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान स्त्री-पुरूष की समानता का जो आदर्श प्रस्फुटित हुआ था, वह ना तो विकसित हो पाया, ना सामान्य जन के विचार और विश्वास बन सका। राजा राममोहन राय से लेकर महात्मा गाँधी और अंबेडकर तक ने स्वतंत्रता और संप्रभुता के सवाल को सामाजिक परिवर्तन से अलग करके नहीं देखा, हालाँकि इस दौर के चिंतकों के दृष्टिकोण में एकरूपता नहीं थी।
जनसंचार माध्यमों के द्वारा एक ऐसी उपभोक्तावादी संस्कृति विकसित की जाने लगी, जिससे व्यक्ति की स्वतंत्र –चेतना और विवेकपूर्ण निर्णय कुंठित होने लगे। जातिवाद, सांप्रदायिकता, धार्मिक तत्ववाद भाषायी वैमनस्य, अंध-क्षेत्रीयतावाद एवं पिछड़ी जतियों के प्रति विद्वेष कभी-कभी भयावह रूप में विस्फोटित होने लगे, जिसका शिकार निर्दोष औरतें हुईं, शोषण का स्वरूप चाहे जो रहा हो। महिलाओं के साथ बढ़ता दुर्व्यवहार स्पष्ट कर देता है कि हम कैसे भारत का निर्माण कर रहे हैं? एक सभ्य और सुसंस्कृत समाज बनाने के बजाय हम उपभोक्ता समाज ही बना सके हैं, जहाँ वस्तु, विचार और भावना केवल खरीदी और बेची जाने वाली वस्तु होती है। वहाँ इन सबकी क़ीमत आँकी जाती है। जो जितना कीमती है, वह उतना अर्थवान है। इस दृष्टिकोण ने केवल उन मूल्यों को संरक्षित और पुष्ट किया है, जो नारी जाति की दासता को व्यापक और मज़बूत करते हैं।
हिंदी के व्यावसायिक सिनेमा ने बीसवीं सदी की नारी की जो तस्वीर प्रस्तुत की है वह वही है जिसके आदर्श धार्मिक पुस्तकों में मिलते हैं और जो प्राक् पूंजीवादी समाज में नारी की वास्तविक स्थिति का प्रतिबिंब है। इसके अनुसार, नारी जीवन की इसके अतिरिक्त और कोई सार्थकता नहीं है कि वह अपने पति और बच्चों के लिए अपने दैहिक पवित्रता की रक्षा करे और हर तरह से अपने पति के प्रति एकनिष्ठ रहे; ऐसा कोई क़दम ना उठाए, जिससे घर की मान-मर्यादा (पुरुषोचित) पर आँच आए। जो नारी इन जीवन-मूल्यों को स्वीकार नहीं करती, उन्हें हिंदी फिल्मों में खलनायिका बनाकर प्रस्तुत किया जाता है। नारी के ये ही दो रूप हिंदी सिनेमा को स्वीकार्य हैं। इनका सम-सामयिक नारी-यथार्थ से कोई संबंध नहीं है।
स्वतंत्रता-संघर्ष के दौर में बहुत-सी ऐसी फ़िल्में बनी थीं, जिनमें प्रतिगामी जीवन-मूल्यों पर चोट की गई थी। ऐसी कई फ़िल्मों में नारी की विडंबनाओं को भी कथानक बनाया गया था। ऐसी फिल्में थीं -‘दुनिया न माने’ (1937), ‘अछूत कन्या'(1936), ‘देवदास'(1935), ‘इन्दिरा एम॰ ए॰'(1934), ‘बाल योगिनी’ (1936), तथा ‘आदमी'(1939 )।

इन फ़िल्मों का निर्माण हालाँकि व्यावसायिक दृष्टि से किया गया था, लेकिन राष्ट्रीय आंदोलन के दौर की

जागरूकता का असर भी इन पर था। इस दौर की फिल्मों में नारी जीवन से जुड़ी ऐसी समस्याओं को उठाया गया था, जिनका संबंध उसकी सामाजिक स्थिति से था। यथा बाल विवाह, वैधव्य, अनमेल विवाह, पर्दा प्रथा, अशिक्षा। इन समस्याओं के प्रति प्राय: प्रगतिशील दृष्टिकोण स्वीकार किया गया था।
फ़िल्मों में बाज़ारीकरण की प्रवृति के विकास ने सामाजिक सोद्देश्यता को तिलांजलि दे दी। फ़िल्म उद्योग व्यवसाय हो गया – बड़ा व्यवसाय। और इससे संबद्ध लोगों ने लाभ – अधिकाधिक लाभ को लक्ष्य में रखा। ऐसे लोगों ने नारी के प्रत्येक पक्ष का शोषण किया ;उसे ऐसे उपादान में बदल दिया, जिसकी ख़ूबियों और खामियों – दोनों का व्यावसायिक उपयोग किया जा सके। नारी जीवन की समस्याओं पर आधारित फ़िल्में भी कृत्रिम आवरण में लिपटी, जीवन की यथार्थ जटिलता से दूर – बहुत दूर नज़र आती हैं। ऐसी फ़िल्मों का समापन भी तर्करहित और शोषणकारी रूढ़िबद्ध जीवन-मूल्य व्यवस्था को उचित ठहराकर होता रहा है।
सिनेमा से समाज और समाज से सिनेमा प्रभावित होता रहा है। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् नया संविधान लागू होने के बाद, विवाह-संस्था को अपेक्षाकृत अधिक जनतांत्रिक बनाने के लिए डॉ॰ भीमराव अंबेडकर ने संसद में ‘हिंदू कोड बिल’ नामक विधेयक प्रस्तावित किए। इस विधेयक के विरूद्ध रूढ़िवादी संस्थाओं और व्यक्तियों ने भयंकर हँगामा किया, परिणामस्वरूप पूरी तरह तो नहीं, किंतु कुछ सीमा तक स्त्रियों के हितार्थ कुछ क़ानून बने। डॉ॰ अंबेडकर का यह योगदान नारी के हित – चिंतन का प्रमाण है।
हिंदी सिनेमा में, तब से तलाक, पारिवारिक एवं सामाजिक पृष्ठभूमि फ़िल्मों का मुख्य विषय हो गईं। उस समय की बनी इस प्रकार की प्राय: सभी फिल्मों में तलाक़ को अभारतीय घोषित कर उसकी निंदा की गई तथा उसे भारतीय संस्कृति के प्रतिकूल बताया गया। छ्ठे और सातवें दशक की फिल्मों में, विशेषकर स्त्री-पुरूष के दांपत्य –संबंधों में प्रतिगामी रुख अख़्तियार किया जाता रहा। साथ ही, विशाल संयुक्त परिवार के गुण गिनाए जाते रहे; इसके टूटन में किसी आधुनिक, शिक्षित बहू का हाथ दिखाया जाता, जिसे तिरस्कृत कर पूरा परिवार फिर एक हो जाता। ‘भाभी, ‘खानदान’, ‘तीन बहूरानियाँ’, ‘दो रास्ते’ सदृश फ़िल्में इसी परंपरा को पोषित करती हैं।
सातवें दशक के उत्तरार्द्ध तक आते-आते आर्थिक संकट तथा नई परिस्थिति के दबाव में संयुक्त परिवार के प्रति मध्यवर्गीय लोगों के भावात्मक लगाव में कमी आने लगी। युवा हो रही नई पीढ़ी के लिए संयुक्त परिवार ही कलह की युद्धभूमि बन गई, जिसका असर फ़िल्मों पर भी दिखता है। पारिवारिक फ़िल्मों की जगह संयुक्त परिवार के बिखराव से दांपत्य जीवन के बिखराव ने ले ली। इसपर आधारित पहली फिल्म ‘तलाक़’ थी। सातवें दशक में ऐसी कई फ़िल्में बनीं, जिसमें पति-पत्नी के संबंधों में तनाव, उनका अलग होना और अंत में पुनर्मिलन दर्शाया गया था। ‘कोरा काग़ज़’, ‘अनुभव’, आविष्कार’, ‘दूरियाँ’, ‘गृह प्रवेश’, ‘थोड़ी सी बेवफाई’, ‘जुदाई’, ‘ये कैसा इंसाफ़’ जैसी फ़िल्में हमारे समाज के बदलाव का सूचक थीं। जया, शबाना, रेखा व अन्य अभिनेत्रियाँ भी इन फ़िल्मों में यह धारणा पुष्ट करती रहीं कि अलगाव के बाद भी प्रेम की भावात्मकता कम नहीं होती। इसलिए अलगाव या तलाक़ के बाद भी औरत किसी अन्य पुरूष के साथ घर बसा ले, ऐसा दर्शाने का साहस व्यावसायिक फिल्में नहीं कर सकी थीं।
फ़िल्मों में पति-पत्नी के कड़ुवे हो रहे संबंधों के सामाजिक यथार्थ को तो उभारा गया, किंतु प्रस्तुति में दृष्टिकोण पुरुष –प्रधान ही रहा। पति-पत्नी के बीच तीसरे का प्रवेश और उससे उत्पन्न ग़लतफ़हमियाँ (अनुभव; गृह प्रवेश ), कामकाजी पति-पत्नी के बीच उत्पन्न तनाव (दूरियाँ ;ये कैसा इंसाफ़ ), पति-पत्नी के परिवार के अन्य सदस्य के कारण उनके बीच उत्पन्न दरार (कोरा काग़ज़ ), पति-पत्नी के भिन्न जीवन-मूल्यों से उत्पन्न तनाव (श्रीमान श्रीमती ;स्वर्ग-नरक )। प्रत्येक फ़िल्म में समापन स्त्री का पुरूष के समक्ष नत होने से हुआ है। ऐसी फ़िल्मों में स्त्रियों का नौकरीपेशा होना, उसका शक्की स्वभाव, स्त्रियों के द्वारा पश्चिमी जीवन शैली अपनाना तथा उसकी कलह करने की प्रवृति को ही दांपत्य जीवन के बिखराव का मुख्य कारण माना गया है। जिन फ़िल्मों में पुरुष को परस्त्रीगामी दिखाया गया है, वहाँ भी यही अपेक्षा की गई है कि पत्नी के रूप में स्त्री धैर्य, प्रेम और त्याग के द्वारा पति को पुन: वापसी के लिए प्रेरित करे। कुल मिलाकर पतिव्रता स्त्री का आदर्श व्यक्त किया जाता रहा। स्त्री का भी कोई व्यक्तिगत जीवन या स्वतंत्र अस्तित्व हो सकता है, इसे ऐसी फ़िल्में स्वीकारने को तैयार ना हो सकी थीं।
पहले व्यावसायिक सिनेमा में स्त्री या तो किसी त्रिकोणात्मक या चतुष्कोणात्मक प्रेमकहानी की नायिका या खलनायिका होती थी या माँ, बहन, बेटी, बहू, पत्नी और सास। पहले प्रेमकहानी के माध्यम से वह मोहक रूप में प्रस्तुत की जाती रही। अधिक से अधिक अंग-प्रदर्शन, श्लील –अश्लील हाव –भाव नायिका एवं खलनायिका दोनों प्रदर्शित करती थीं। अंतर –मात्र यह होता था खलनायिका होटल की कैबरे डांसर या खलनायक के मनोरंजन का साधन होती थी, नायिका कोमल और शर्मीली। इन फ़िल्मों में प्रेम –संबंधों का आरंभ पुरुष के बल और स्त्री के शारीरिक सौंदर्य के माध्यम से होती है। गुंडों द्वारा नायिका के बलात्कार की कोशिश और नायक द्वारा उसकी रक्षा कहानी को आगे बढ़ाती है। ये फ़िल्में नारी की दैहिक पवित्रता संबंधी परंपरागत धारणा पुष्ट करती हैं। इन फ़िल्मों में नारी सौंदर्य का अर्थ है — पुरुष की यौन इच्छाओं को तृप्त करने का माध्यम। नायिका और खलनायिका, दोनों ही पुरुष की भोग्या होती है — वस्तुमात्र। इन फ़िल्मों में पुरुष बल से आतंकित स्त्री अपनी दैहिक पवित्रता अक्षुण्ण रखने हेतु अधिक चिंतित दिखाई देती है —- एक मानवी के रूप में अवमानित होने हेतु नहीं। इन फ़िल्मों में बलात्कार से प्रतारित स्त्री के मुँह से बार –बार अपने पति या प्रेमी को यही कहलाया जाता है कि ” मैं अपवित्र हो गई …. अब मेरे पास तुम्हें देने के लिए कुछ नहीं है। ” ऐसी फ़िल्में स्त्री के अन्तर्मन में शारीरिक शुचिता को लेकर एक ग्रंथि बना जाती, जिससे वह पूरी ज़िंदगी उबर नहीं पाती। ऐसी फ़िल्मों के संदर्भ में एक प्रश्न उभरता है कि स्त्री केवल योनि होती है ? यौन शोषण से उनकी दैहिक और मानसिक क्षमता क्या वाकई कम हो जाती है?
व्यावसायिक हिंदी फ़िल्मों में बलात्कार या यौन शोषण के दृश्यों के प्रति जो रवैया व्यक्त होता है, वह इसी अमानवीय मनोवृत्ति को बढ़ावा देता है। इससे क्रूरता और हिंसा की मात्रा बढ़ी ही है। शोषित स्त्री की विवशता दर्शक को रोमांचित करते हैं और उसकी प्रतिहिंसा इस यथार्थ को स्थापित करती है कि क़ानून अपंग है और समाज चेतनाशून्य। फ़िल्मों ने स्त्री की दोयम दर्ज़े की स्थिति को भी महिमामंडित किया है। नायिका को सीता, सावित्री और अनसूया सरीखी दर्शाकर खलनायक को पश्चिमी अंधानुकरण में स्वच्छंदता का ग़लत बोध करता दर्शाकर। आदर्श नारी मातृत्व का पोषक होती है। माँ के अतिरिक्त अन्य सामाजिक भूमिका की कल्पना आठवें दशक तक की फ़िल्मों में नहीं की जा सकती थी।
माँ हिंदी फ़िल्मों का महत्वपूर्ण चरित्र है। माँ को केंद्र में रखकर बनी अधिकांश फ़िल्में बॉक्स ऑफिस पर सफल हुईं। ‘मदर इंडिया’, दीवार’, ‘माँ’ इसके बेहतर उदाहरण हैं। माँ पर केंद्रित फ़िल्मों में माँ त्याग, ममत्व और करुणा की प्रतिमूर्ति होती है। बहुत कम फ़िल्में ऐसी हैं, जिनमें माँ की इससे अलग छवि दर्शायी गई है। माँ के बुरे चरित्र का अर्थ है सौतेली माँ। भारतीय परंपरा के अनुसार, सौतेली माँ का नकारात्मक स्वरूप घोषित है। हिंदी फ़िल्मों में माँ आदर्श की प्रतिमूर्ति है मगर सौतेली माँ खलनायिका।
‘मदर इंडिया’, दीवार’ से लेकर ‘ममता ‘ तक की सभी फ़िल्मी माएँ सामंती आदर्शों और उच्च मूल्यों में विश्वास रखती हैं तथा अपनी संतान को ईमानदार, सच्चा और स्वाभिमानी बनाना चाहती है, चाहे वह कृषक पत्नी बनी नर्गिस (मदर इंडिया) हो या बेबस निरूपा राय (दीवार), या फिर तवायफ़ बनी सुचित्रा सेन(ममता)। इन फ़िल्मों में मातृत्व के महिमामंडन का कारण भारत का मध्यवर्ग है, जो सिनेमा का ख़ास वर्ग है, उसने नारी को समर्पिता पत्नी और मर-मिटनेवाली माँ के रूप में ही स्वीकारा है। दफ़्तर में काम करनेवाली या देश के विकास में संलग्न स्त्री भी एक अच्छी पत्नी और बेहतर माँ हो सकती है – यह स्वतंत्र छवि व्यावसायिक सिनेमा में देखने को नहीं मिलती।
‘ख़ूबसूरत’ फ़िल्म में एक साधारण, किंतु अनुशासन की कठोर पालक माँ है, जिसे नायिका रेखा अपने व्यवहार से बदलती है। ‘धूल का फूल’, ‘आसरा’, ‘हरे काँच की चूड़ियाँ’, ‘जूली’, त्रिशूल’, ‘लावारिस’ जैसी फ़िल्में बिन ब्याही माँ पर आधारित है, पर वह मुख्य नायिका नहीं होती, नायक की माँ होती है और दोषी पुरुष को उसके समकक्ष महत्ता प्रदान करते हुए खड़ा किया जाता है, क्योंकि ना तो ऐसे पुरुष की सामाजिक भर्त्सना होती है, ना उक्त स्त्री उसके प्रति प्रेम कम करती है। वह सामाजिक प्रतारणाओं को अकेली झेलती हुई अक्सर मर जाती है। निर्देशक इस समस्या के दोषी पुरुष को किसी अनायास घटित घटना से जोड़कर उसे दर्शक के कोप से बचा ले जाता है। बीसवीं सदी तक सिनेमा में नारी की छवि जिस रूप में उभरी है, उसका उद्देश्य पुरुष का वर्चस्व और स्त्री को दोयम दर्ज़े की बनाए रखना ही है। कुछ फ़िल्मों में नारी जीवन की वास्तविकताओं को, उसके मनोभावों को, उसकी आकांक्षाओं को, उसके दोहरे शोषण को सही परिप्रेक्ष्य में भी देखा है —- उसके जीवन के यथार्थ को प्रगतिशील दृष्टिकोण से देखा –समझा है। आठवें दशक में बनी कुछ फ़िल्मों (भूमिका, सुबह, अर्थ, बाज़ार, मासूम ) में शबाना और स्मिता को लेकर निर्देशक ने नारी जीवन की जटिलता को गहराई से समझने-समझाने का सराहनीय प्रयास किया है।
‘सुबह’ इस प्रश्न को मुखर करती है कि नारी की वैयक्तिक अस्मिता और उसके आत्मसम्मान का क्या कोई मूल्य है ? ‘सुबह’, ‘मिर्च मसाला’, ‘भूमिका’, ‘अर्थ’, ‘बाज़ार’ जैसी फ़िल्में इसी प्रश्न के साथ उत्तर के लिए संघर्ष को मुखर करती है। यह सच है कि कुछ वर्षों में स्त्री की नई और बेहतर छवि उभरकर आई है, किंतु यह भी सच है कि सत्तर के दशक के बाद की फ़िल्मों में नायिकाओं के रोल कुछ अर्थपूर्ण होते थे। परंपरागत ढाँचे में भी नायिकाएँ अपनी भूमिका को कुछ अर्थ दे सकती थीं। फ़िल्मों में ‘अंकुर’ से ‘अर्थ’ तक की यात्रा में क्या बदलाव आया — इसपर अभिनेत्री शबाना आज़मी की प्रतिक्रिया यही रही कि “समाज का एक हिस्सा आज भी इंतिहाई तौर पर होस्टाइल (विरोधी ) नज़र आता है। हमारे समाज में प्रतिरोध केवल पुरुष की ओर से ही नहीं, स्त्रियों की ओर से भी है। ….जब औरतें माँग करेंगी तो निश्चित रूप से अशांति की स्थिति पैदा होगी। ”
‘उद्भावना ‘के संपादक अजेय कुमार ने फ़िल्म ‘फायर’ पर अपना मत व्यक्त किया कि “भारत में जो हिंदू नारियाँ हैं, उनमें अगर होमो-इरोटिसिज़्म है, यदि वे लेस्बियन हैं तो उसे एक्सप्लोर करनेवाली एक जेनुइन फिल्म बने। ….. हमारे यहाँ सेक्स का बहुत बड़ा इनपुट है औरतों के बीच! वह समलैंगिकता नहीं है। हमारे समाज में औरतें जितना खुलकर सेक्स पर बातें कर लेती हैं या उनका जो सेक्स पर कंट्रोल है उतना शायद मर्दों के बीच नहीं है। तो मैं निस्संदेह चाहूँगा कि उद्दाम फ़ीमेल सेक्सुअलिटी की फ़िल्म बने। हेटरोसेक्सुअलिटी की भी वैसी फ़िल्म बने। …… होमोसेक्सुअलिटी पर भी फ़िल्म बननी चाहिए। इनसेस्ट पर भी फ़िल्म बननी चाहिए क्योंकि यह भी है हमारे समाज में। देवर-भाभी के एरोटिक रिश्तों पर भी फ़िल्म बननी चाहिए। “
स्त्रियों की दैहिक-मानसिक व्यवस्थाओं व समस्याओं के संबंध में अजेयजी का दृष्टिकोण व्यापक है। ग़ौरतलब है कि मुंबइया सिनेमा की नायिकाएँ जिस दुनिया से आती हैं, जिस भाषा में बात करती हैं, जिस माहौल में रहती हैं, वह बिलकुल अलग तरह का माहौल होता है। तमाम पत्र –पत्रिकाओं व दूसरे माध्यमों से उनके व्यक्तिगत जीवन के बारे में जो जानकारियाँ सामान्य मध्यवर्गीय पाठकों को मिलती है, वे अक्सर उनके जीवन पर ज़बर्दस्त प्रभाव डालती हैं। कितनी अभिनेत्रियाँ इस बात से परेशान हैं कि उनके जिस व्यक्तित्व को मीडिया दर्शाता है, वह वास्तव में होता ही नहीं है।
एक बात और चौंकानेवाली है कि कड़ी मेहनत और बहुत से समझौते के बाद कैरियर बना सकने वाली सफल अभिनेत्रियाँ विवाह के बाद एकदम गायब –सी हो जाती हैं। जया भादुड़ी, हेमा मालिनी, नीतू सिंह, बबीता, डिंपल से लेकर श्रीदेवी, माधुरी, करिश्मा, जूही, काजोल और ऐश्वर्या आदि सभी सफल अभिनेत्रियों ने विवाह के बाद संन्यास की घोषणा तो नहीं की, किंतु ग्लैमरस और शानदार कैरियर को ख़ामोशी से विदा हो जाने दिया। दो वर्ष – पाँच वर्ष या उससे अधिक समय के बाद उनकी वापसी तो हुई, पर उस तरह नहीं —- उस रूप में नहीं। आमतौर पर बॉलीवुड में यह माना जाने लगा कि विवाह के बाद एक अभिनेत्री का कैरियर खत्म हो जाता है। करीना कपूर ख़ान एवं विद्या बालन कपूर ने विवाह के बाद भी अपना फ़ोकस कैरियर पर रखा और निरंतर सफलता प्राप्त कर इस मान्यता को झुठला दिया कि नायिकाओं के व्यक्तिगत जीवन का दर्शकों पर कोई ख़ास प्रभाव पड़ता है।
बाज़ारीकरण के इस दौर में अभिनेत्रियों का मोहक होना अनिवार्य माना गया। मोहक अर्थात् सुंदर और सेक्सी। बॉलीवुड में लंबे समय तक सेक्स अपील की चर्चा या तो दबे स्वर में होती, या हेलन, सिल्क स्मिता, बिन्दु, अरुणा ईरानी, ममता कुलकर्णी सरीखी अभिनेत्रियों से संबद्ध। मगर बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध, लगभग सभी सफल अभिनेत्रियाँ अपनी सेक्स अपील को महत्वपूर्ण मानती हैं। रेखा, श्री देवी, माधुरी दीक्षित के दौर ने नायिका की सेक्सी छवि को भी महत्वपूर्ण बना दिया। ‘बेटा’ में माधुरी जिस बोल्डनेस के साथ ‘धक-धक करने लगा ‘गाती दिखी, उसके बाद तो अभिनेत्रियों ने इसे सफल होने का नुस्खा मान लिया। ऐश्वर्या, प्रियंका, करीना कत् रीना ने मलाइका, मल्लिका और यदा-कडा राखी सावंत की फिल्म में ज़रूरत को समाप्त कर दिया है। आइटम गीत को खुद के लिए चुनौती मानकर ये उनमें बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही हैं और गर्वित हो रही हैं।
समाज की घिसी –पिटी मानसिकता को झकझोरते हुए अनेक फ़िल्मकारों ने पर्दे पर आधुनिक स्त्री की महत्वपूर्ण छवि प्रस्तुत की है। श्याम बेनेगल ने या तो नायिका –प्रधान सशक्त फ़िल्में बनाईं या संदेश-प्रधान सपाट फ़िल्मों को हरा-भरा करने की कोशिश की है। ‘भूमिका’ की स्मिता पाटिल हो या ‘हरी भरी ‘की शबाना आज़मी या ‘जुबैदा’की करिश्मा। ये स्त्रियाँ कहीं अधिक सशक्त और अर्थपूर्ण हैं। ‘भूमिका ‘की उषा और ‘ज़ुबैदा’ की ज़ुबैदा हमें चौथे –पाँचवे दशक में ले जाती हैं। इसीप्रकार शांताराम की ‘आदमी’, , विमल राय की ‘सुजाता’, ‘बंदिनी ‘आदि फ़िल्में एक बार रुककर सोचने को मज़बूर करती रही हैं।
पिछले कुछ सालों में बदलते समय को ध्यान में रखकर छोटे-बड़े पर्दे पर नई अभिनेत्रियाँ उभरी हैं। इक्कीसवीं सदी की इन नायिकाओं ने समय की माँग को, उसकी चुनौतियों को स्वीकारा। हालाँकि बाज़ारीकरण के इस दौर में, स्त्री-केंद्रित फ़िल्में बनाने में फ़िल्मकारों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। उन्हें बतौर मुख्य नायक कोई बड़ा अभिनेता नहीं मिल पाता। नायिकाओं में, माधुरी दीक्षित, प्रीटी जिंटा, ऐश्वर्या रॉय, काजोल, करिश्मा कपूर, रानी मुखर्जी से लेकर कत् रीना कैफ, करीना कपूर, प्रियंका चोपड़ा, दीपिका, परिणति चोपड़ा, आलिया भट्ट व कंगना रणौत प्रभृत अभिनेत्रियों ने कमर्शियल हीरोइन होने के पैबंद के बावजूद अपनी भूमिकाओं को एक ताज़गी दी है।
आधुनिक सिनेमा ने नारी से संबद्ध वर्जित विषयों को फ़िल्मों के माध्यम से ढूँढ़ने व उनका चित्रण करने की कोशिश की है। जैसे—लैंगिकता, तलाक़, विवाह-पूर्व के संबंध, विवाहेतर संबंध, यौन शोषण, स्त्री मुक्ति के एहसास एवं शोषण के प्रतिरोध को ‘सलाम नमस्ते’, ‘चोरी-चोरी चुपके-चुपके’, ‘क्या कहना’, ‘हीरोइन’, ‘सात खून माफ’, ‘कहानी’, ‘बरफ़ी’, ‘इंगलिश विंगलिश’, ‘नो वन किल्ड जैसिका’, ‘लज्जा’, ‘हाइवे’, ‘क्वीन’, ‘गुलाब गैंग जैसी फ़िल्मों का विषय बनाया है।
‘लज्जा’ में चारों नायिकाओं के नाम क्रमश: वैदेही, मिताली, जानकी और रामदुलारी हैं अर्थात् सीता के नाम, जो नारी जीवन के संघर्ष और शोषण का द्योतक है। चार भिन्न स्त्री किरदारों ने समाज के पुरुषों की वर्चस्व-नीति तथा सामाजिक कुप्रथाओं को प्रश्न बनाकर दर्शक की सोच को झकझोरने का काम किया है। ‘हीरोइन’ में करीना ने माही अरोड़ा की व्यक्तिगत और व्यावसायिक जीवन –संघर्ष तथा आडंबर के साथ मिली सफलता और उसके खोखलेपन को बखूबी उभारा है। इन राहों पर पुरूषों की शोषण-नीति को नग्न किया गया है। ‘कहानी’, विद्या बालन की महिला –प्रधान कहानी है। विद्या ने अपनी भूमिका से यह जतला दिया कि स्त्री कभी कमज़ोर नहीं, कहीं कमज़ोर नहीं। न बुद्धि में, न साहस और न चतुराई और कर्मनिष्ठा में।
‘क्वीन’ की नायिका कंगना रणौत ने अपनी भूमिका से इस फ़िल्म को सामान्य नायक प्रधान फ़िल्मों से न केवल अलग किया, बल्कि एक विशिष्ट पहचान दिलाई। यह फ़िल्म एक डरी सहमी लड़की को परिस्थितियों के संग, उसकी अनुकूलता-प्रतिकूलता में आत्मविश्वासी, दृढ़ और सबल दिखाकर स्त्री –मुक्ति के संदर्भ से जोड़ती है।
‘सदमा’ और ‘चालबाज़’ में स्त्री की भिन्न-भिन्न छवि प्रस्तुत करने वाली श्री देवी ‘इंगलिश विंगलिश’ में एक साधारण घरेलू स्त्री की टूटती संवेदना को सरोकार का हिस्सा बनाती हैं। अंग्रेज़ी ना बोल सकने की हीन भावना एक भारतीय शहरी गृहिणी को बाहर तो बाहर, घर के अंदर भी किस क़दर तोड़ती है और उससे उबरकर वह ख़ुद को कितनी गौरवान्वित महसूस करती है, श्री देवी ने स्त्री मनोविज्ञान को सरलता से उभारा है। अंग्रेज़ी सीखने के बावजूद हवाई जहाज़ में हिंदी पत्रिका माँगना यह इंगित करता है कि अंग्रेज़ी भाषा में अल्पज्ञता का यह कतई अर्थ नहीं है कि अमुक स्त्री में बुद्धि, विवेक, निर्णयात्मक क्षमता, साहस, लगन ….इन सबसे भी ऊपर उसकी संवेदनशीलता में कोई कमी है। किसी भाषा की अल्पज्ञता के कारण व्यक्ति /स्त्री की अवमानना करने या मानसिक प्रतारणा देनेवाले सभ्यों की तुच्छता की परिचायक है यह फ़िल्म।
हाइवे’ में आलिया भट्ट ने सिद्ध कर दिया कि प्रतिभा तो हीरे की तरह होती है, जितना तराशो, उतनी निखरेगी। हमारे समाज में स्त्री की प्रतिभा भी उसकी अस्मिता की ही तरह अनदेखी क़ैद में है। निर्देशक इम्तियाज़ अली ने तथाकथित सभ्रांत, पश्चिमी सभ्यता से लैस, पूंजीपति वर्ग की स्त्रियों के शोषण की कलई इतने धारदार तरीके से खोली है, जो वाकई संवेदना और चेतना —दोनों को झकझोरती है। यौन शोषण का सच — बाज़ार का सच, स्त्रियों को लाभ के लिए इस्तेमाल करने का घिनौना सच चंद संवादों में उभरकर आ जाता है।
महानायक अमिताभ बच्चन कहते हैं — “महिला केंद्रित व महिला विशेष सिनेमा भारतीय सिनेमा की शान रहा है। नर्गिसजी, नूतनजी, मीना कुमारीजी जैसी अभिनेत्रियों से लेकर हेमाजी व जयाजी जैसी अभिनेत्रियाँ इसप्रकार की फ़िल्मों की मुख्य पात्र रही हैं। वहीं आज के दौर में विद्या बालन ने ये कमान संभाल रखी है। महिलाएँ भारतीय सिनेमा का अटूट अंग हैं और वे अपने किरदारों के दम पे हमें आश्चर्यचकित करना कभी नहीं छोड़ेंगी। ” महिला निर्देशक जोया अख़्तर व गौरी शिंदे का मानना है कि “आज की महिलाएँ /अभिनेत्रियाँ केवल साज- सज्जा या मसाले इत्यादि की वस्तुएँ नहीं, स्वयं की पहचान को उभारती शक्तिशाली, संजीदा पात्र हैं। फ़िल्में, जैसे – ‘लेडीज वर्सेज़ रिक्की बैहल’, ‘इश्किया’, ‘तनु वेड्स मनु ‘, ‘ज़िंदगी ना मिलेगी दोबारा’, ‘कहानी’, ‘एक था टाइगर’, ‘बरफी’, ‘क्वीन’ जैसी फ़िल्में इस नव सोच का प्रतीक हैं।”
निर्माता निर्देशक महेश भट्ट का कथन है – “हम एक ऐसी सिनेमा प्रणाली की ओर बढ़ते जा रहे हैं जिसकी मुख्य दावेदार महिलाएँ हैं। “गुलाब गैंग’ जैसी फ़िल्म समाज की माँग भी है और पुरूष-वर्चस्व का प्रतिरोध भी फ़िल्मों ने घिसे-पिटे आदर्श से बाहर आने की चेष्टा आरंभ कर दी है, आवश्यकता इस बात की है कि होड़ में न पड़कर अभिनेत्रियाँ समाज में स्त्रियों की यथार्थ स्थितियों, उनकी समस्याओं के साथ ही सशक्तिकरण से जुड़े किरदारों को बढ़ावा दें, क्योंकि सिनेमा का सीधा असर दर्शक के दिलो-दिमाग पर होता है। हिंदी सिनेमा में बदलाव ने पैर जमाने शुरू कर दिए हैं। ज़रूरत है उसे सही ज़मीन देने की, जो निर्माता, निर्देशक, अभिनेता, अभिनेत्री के साथ ही दर्शक की उर्वर और परिष्कृत सोच से ही संभव होगा….ज़रूर होगा। हम उजाले की ओर अग्रसर हैं। अंधेरा है, मगर दीया तले और इससे उबरा जा सकता है। आमीन!
खोल दो खिड़कियाँ और रोशनदान 
सब रोशनी की हर किरण पर तुम्हारा भी अधिकार है
Anil Anup

Anil Anup

राज्य ब्यूरो प्रभारी पंजाब, हिमाचल, हरियाणा और जम्मू-कश्मीर l

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