आखिर बेटियाँ इसीलिए पैदा की जाती रहेंगी? 

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बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ।’ उसके पीछे एक मनोवैज्ञानिक सोच थी। हरियाणा में कन्या भ्रूण हत्या का चलन आम रहा है। शायद आज भी है! नतीजतन लैंगिक फासले गहरे होते गए हैं और पुरुषों की तुलना में महिलाएं बहुत कम हैं
-अनिल अनूप 

आखिर कब तक क्षुब्ध हों! गुस्सा करें और आक्रोश जताएं! कब तक मोमबत्ती मार्च सजाएं! अदालतें फांसी की सजा सुनाएं! बच्ची हो, नाबालिग हो या युवती हो, कब तक उन्हें जख्मी, लहूलुहान होकर दम तोड़ते देखते रहेंगे! बलात्कार होते रहे हैं और अब भी जारी हैं। यह पाशविकता और क्रूरता की कौन-सी जमात है, जो बच्ची के साथ दुष्कर्म करते नहीं घबराती, किसी युवती को मारते-पीटते और उसका शील भंग करते हुए नहीं सकुचाती और न उसे मूल्यों की परवाह है और न ही किसी के सम्मान का आदर है। फांसी का खौफ भी नहीं दीखता। मप्र में दुष्कर्म और हत्या के एक मामले में जितनी जल्दी फांसी की सजा सुनाई गई, उससे भी यह जमात सन्न और स्तब्ध नहीं हुई। देश की राजधानी दिल्ली शर्मसार है, क्योंकि तीन दिनों में ही बर्बरता के चार मामले सामने आए हैं। न जानें कितनी चीखें, कितने जख्म, कितनी पीड़ा अब भी अनकही, अनसुनी और अनलिखी होंगी! गुडि़या की चीखें आज भी शिमला के पर्यावरण को चीर रही होंगी! बलात्कारियों को फांसी का खौफ नहीं, न्यायिक प्रक्रिया बेहद लंबी और थकाऊ है, जेल में बंद ये शैतान कभी भी छूट सकते हैं, तो आखिर समाधान क्या है? क्या अब यह मान लें कि बेटियों को जन्म दो और बलात्कार होने दें? कितना अमानवीय और शर्मसार एहसास है यह? यह भारतीय संस्कृति का ही समाज है या ‘राक्षसों की राजधानी’ है? प्रधानमंत्री मोदी ने हरियाणा के पानीपत में एक नारा दिया था-‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ।’ उसके पीछे एक मनोवैज्ञानिक सोच थी। हरियाणा में कन्या भ्रूण हत्या का चलन आम रहा है। शायद आज भी है! नतीजतन लैंगिक फासले गहरे होते गए हैं और पुरुषों की तुलना में महिलाएं बहुत कम हैं। फिलहाल स्थितियां कुछ संवरने लगी हैं। उसी हरियाणा के रेवाड़ी शहर की वह लड़की, जो सीबीएसई टॉपर थी और राष्ट्रपति ने जिसे सम्मानित किया था। उस मेधावी लड़की के भीतर न जाने कितने सपने, कितने लक्ष्य पल रहे होंगे! उसने परिवार, शहर, जिले और राज्य का नाम और दर्जा गर्वोन्नत किया था, लेकिन दरिंदों ने उसे भी नहीं छोड़ा और उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया। साबित हो गया कि मेधावीपन भी बलात्कार से बचने की गारंटी नहीं है। वहशियों ने उस लड़की की अस्मत लूटकर एक निश्चित भविष्य को ही कुचल दिया। जब वह बच नहीं पाएगी, तो पढ़ेगा कौन? जब वह पढ़ने जा रही थी, तो उसकी इज्जत से खिलवाड़ किया गया। दुर्भाग्य है कि मुख्यमंत्री स्वच्छता पर तो बयान पेलते रहे, लेकिन रेवाड़ी कांड पर चुप्पी से खिसक लिए। 15 सितंबर की रात तक ‘दरिंदों’ को गिरफ्तार नहीं किया जा सका था। प्रधानमंत्री ने जिस राज्य में इतना भावुक नारा दिया था, उसकी बेटियां तो बलात्कारियों के लिए ही हैं, ऐसा महसूस होने लगा है। सवाल है कि ऐसे आंदोलन क्यों नहीं उभरे, जो ‘राक्षसी जमात’ का विरोध कर सकें, उनका सामाजिक-आर्थिक बहिष्कार कर सकें? प्रधानमंत्री मोदी ने लालकिले की प्राचीर से नसीहत के साथ-साथ निर्देश भी दिए थे कि मां-बाप देर रात घर लौटे बेटे से भी पूछें कि कहां से आ रहे हैं जनाब? जिस राक्षस ने दफ्तर में लड़की को बेरहमी से पीटा और उसका वीडियो बनाया गया, उसके पुलिसिया बाप का बयान पढ़ लीजिए, साफ हो जाएगा कि बेटों के प्रति माता-पिता का रवैया कितना छूट वाला रहता है? फिर स्कूलों में ‘नैतिक शिक्षा’ का पाठ पढ़ाकर क्या हासिल होगा? उस आवारा लड़के की गिरफ्तारी भी तब संभव हुई, जब गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने दिल्ली के पुलिस कमिश्नर को आदेश दिए। बहरहाल यह समस्या अब सामान्य रूप में नहीं रह गई है। महिला थाने बनाने या सीसीटीवी कैमरे लगाने से इसका कोई समाधान नहीं निकलने वाला है। 2016 के आंकड़ों के मुताबिक, देश भर में 38947 रेप के मामले दर्ज किए गए। उसके बाद के आंकड़े तो और भी खौफनाक होंगे! दिल्ली में भी औसतन 2000 से अधिक बलात्कार दर्ज होते रहे हैं। यह तो दिल्ली और आसपास के शहरी इलाकों का विदू्रप यथार्थ है। देश के दूरदराज और गंवई इलाकों में क्या जुल्म हो रहा है, उसका पूरा यथार्थ हम नहीं जान सकते। कानून और अदालतों के जरिए बलात्कार सरीखी मनोवृत्ति से नहीं लड़ा जा सकता। दरअसल बेटी बचाना किसी की भी प्राथमिकता नहीं है, लिहाजा अब जरूरत ऐसे जन-आंदोलनों की है, जो बलात्कारी को धर दबोचें और उसे ‘नपुंसक’ बना दें। हम मानते हैं कि यह कृत्य कानून की भाषा में ‘अवैध’ है, तो फिर क्या किया जाए। नैतिकताओं से ‘राक्षस’ काबू आए हैं कभी? फांसी के फंदे पर लटकाना भी आसान नहीं है। तो क्या हमारी बेटियां बलात्कारियों की हवस के लिए ही जन्म लेती रहें?

Anil Anup

Anil Anup

राज्य ब्यूरो प्रभारी पंजाब, हिमाचल, हरियाणा और जम्मू-कश्मीर l

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