अलविदा कलैनार’

  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  

 

अनिल अनूप 

तमिलनाडु के पांच बार और कुल 19 सालों तक मुख्यमंत्री रहे एम. करुणानिधि नहीं रहे। बेशक 94 साल की उम्र में उनकी पार्थिव सांसें उखड़ गईं और जिस्म पत्थर-सा हो गया। चूंकि मौत शाश्वत है, लिहाजा करुणानिधि को भी कुदरत की उसी प्रक्रिया से गुजरना पड़ा, लेकिन जो जनसमूह उन्हें ‘कलैनार’ के रूप में जानता है, जिन गरीबों, पिछड़ों, दलितों, अति पिछड़ों और महिलाओं ने उनमें ‘मसीहा’ की छवि देखी है, जिस तरह जनाकांक्षा, जनाधार, जन-विश्वास से उनका चिरंतन जुड़ाव रहा, उनके लिए करुणानिधि का निधन कैसे हो सकता है? उनके लिए वह हमेशा अजर-अमर रहेंगे, बेशक करुणानिधि का पार्थिव देहावसान जरूर हुआ है। करुणानिधि के पार्थिव अंत के साथ ही एमजी रामचंद्रन और ‘अम्मा’ जयललिता की उस राजनीतिक पीढ़ी का भी अंत हो गया है, जो जनता के साथ प्रत्यक्ष जुड़ाव और भावुक बंधन की ऐतिहासिक उदाहरण रही है। नतीजतन तमिलनाडु की राजनीति में ऐसा ‘शून्य’ महसूस किया जाएगा, जिसकी भरपाई युवा राजनीतिक पीढ़ी तो कमोबेश नहीं कर पाएगी। सुपरस्टार रजनीकांत और कमल हासन की राजनीति भी ‘कलैनार’ की विदाई का विकल्प फिलहाल नहीं बन सकती। करुणानिधि ने जिस अस्पताल में मंगलवार 7 अगस्त की सायं 6.10 बजे आखिरी सांस ली, उसके बाहर एक भावुक और शोकाकुल भीड़ दहाड़ें मार-मार कर रो रही थी। कुछ समर्थक छातियां पीट रहे थे। कइयों ने अपने मोबाइल की रोशनी जलाई और करुणानिधि के चित्र के साथ अपनी संवेदनाएं व्यक्त कीं। टीवी चैनलों पर ऐसी व्याकुल तस्वीरें देखकर मन और आंखें भर आईं। किसी नेता के प्रति ऐसा जन-जुड़ाव हाल के कालखंड में तो हमने नहीं देखा। इस जुड़ाव के कुछ बुनियादी कारण भी रहे हैं। करुणानिधि ने अपनी सत्ता के दौरान पिछड़ी जातियों का आरक्षण 25 फीसदी से बढ़ाकर 31 फीसदी किया था। अति पिछड़ा वर्ग भी बनाया और उन्हें 20 फीसदी आरक्षण मुहैया कराया। तमिलनाडु में सरकारी राशन की दुकानों पर 1 रुपए प्रति किलो चावल का भी बंदोबस्त कराया। कानून पारित करा महिलाओं को उनके पिता की संपत्ति में बराबर का हिस्सा तय कराया और स्थानीय निकायों में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण दिया। जिस शख्स ने फिल्म पटकथाकार के तौर पर करियर शुरू किया, उसने अन्नादुरई के नेतृत्व में द्रविड़ आंदोलन से गुजरते हुए एक महान समाजसेवी और सुधारक तक की यात्रा की, उसके लिए व्यापक भीड़ क्यों नहीं व्यथित होगी और बिलख कर रोएगी? दबे-कुचलों और वंचितों को मुख्यधारा में लाने का निरंतर काम किया था ‘कलैनार’ ने। नतीजतन वह 13 चुनावों में ‘अजेय विधायक’ रहे, बेशक एमजीआर और जयललिता की राजनीति की तुलना में उन्हें सत्ता से बाहर भी होना पड़ा, लेकिन वह जिंदगी भर लोगों की ‘करुणा’ ही रहे। द्रमुक जैसी क्षेत्रीय पार्टी के अध्यक्ष होने के बावजूद करुणानिधि राष्ट्रीय नेता माने जाते रहे। निश्चित तौर पर वह कद्दावर शख्सियत थे। वह उत्तर और दक्षिण के बीच एक ठोस पुल की भूमिका में भी रहे, हालांकि शुरुआत में वह हिंदी-विरोधी रहे। दरअसल अन्नादुरई के नेतृत्व में करुणानिधि ‘ब्राह्मणवादी’ मानसिकता और वैचारिकता के विरोधी थे और हिंदी भाषा को भी उससे जोड़कर उन्होंने देखा। करुणानिधि शायद ही कभी हिंदी बोले हों, लेकिन बाद में उनकी सोच व्यापक हुई। वह राजनीति में भी झलकी। केंद्र में वाजपेयी सरकार के दौरान करुणानिधि की द्रमुक एनडीए की घटक बनी रही और सरकार में भी भागीदार बनी। आपातकाल में जेल की यातनाएं झेलने के बावजूद करुणानिधि ने कांग्रेस नेतृत्व वाले यूपीए का समर्थन किया और द्रमुक 10 सालों तक मनमोहन सरकार में भी शामिल रही। करुणानिधि तमिल साहित्य के भी महान रचनाकार माने गए। विभिन्न विधाओं में उन्होंने करीब 100 किताबें लिखीं। उन्होंने ‘मुरासोली’ अखबार का प्रकाशन भी शुरू किया, जिसे बाद में द्रमुक का मुखपत्र बना दिया गया। लिहाजा उन्हें ‘कलैनार’ विशेषण दिया गया, जिसका अर्थ है-कलाकार। सचमुच वह जमीन से जुड़ी राजनीति और सामाजिक जीवन के महान कलाकार थे। बहरहाल उनके पार्थिव महाप्रयाण से जो खालीपन पैदा हुआ है, उसके भरने में कितना वक्त लगेगा, फिलहाल कहा नहीं जा सकता। राष्ट्रपति कोविंद और प्रधानमंत्री मोदी समेत कई राष्ट्रीय नेताओं ने करुणानिधि के प्रति अपनी शोक संवेदनाएं व्यक्त की हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने तो चेन्नई जाकर श्रद्धांजलि दी है। हमारी ओर से भी ‘अलविदा कलैनार’…, लेकिन हम करुणानिधि की विरासत के मरने की बात नहीं कर सकते।

Anil Anup

Anil Anup

राज्य ब्यूरो प्रभारी पंजाब, हिमाचल, हरियाणा और जम्मू-कश्मीर l

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

%d bloggers like this: