बंधुआ वेश्यावृत्ति

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अनिल अनूप 

जब पति डेंगू के कारण मौत के मुंह में समा गया और परिवार ने साथ छोड़ दिया तो दीपशिखा (बदला नाम) उन चालाक लोगों के खेमे में फंस गई, जहां से मुक्ति पाने में दीपशिखा को एक साल लग गया।

पश्चिमी बंगाल की रहने वाली इस युवती ने जब अंतरजातीय विवाह कर अपना घर बसाया तो परिवार ने भी उससे मुंह मोड़ लिया। समाज को अपना परिवार मानने वाली इस युवती ने अपने पति के साथ पश्चिमी बंगाल से बेंगलोर के लिए पलायन कर लिया। वहां दीपशिखा ने एक बेटी को जन्म दिया।

मगर कुछ समय बाद बेंगलोर में डेंगू की चपेट में आने से पति की अकस्मात मौत ने दीपशिखा की जिंदगी में तूफान ला दिया। अपने परिवार को खो देने वाली युवती ने जब वापस पश्चिमी बंगाल में आकर अपनी मौसी का दरवाजा खटखटाया तो उसको मौसी ने पनाह दी। मौसी मोमोज़ बेचकर अपना गुजारा करती थी।

मौसी की दुकान पर मोमोज़ खाने के लिए आने वाली पंजाब की एक युवती ने जब मोमोज़ की दुकान पर दीपशिखा और उसकी छोटी बच्ची को देखा तो उससे उसकी कहानी जानी और दीपशिखा की मजबूरी का फायदा उठाकर पंजाब में अच्छा काम और उसका अच्छा दाम दिलाने का वादा करके पश्चिमी बंगाल से पठानकोट पंजाब ले आयी।

दीपशिखा ने अपनी बेटी को अच्छी परवरिश न देने के कारण किसी परिचित के यहां रख दिया और उसने सोचा कि पंजाब जैसे विकसित राज्य में वह काम करके अपना गुजारा करेगी और किसी और पर निर्भर नही रहेगी। किन्तु जिन लोगों की चिकनी—चुपड़ी बातों में आकर वह पंजाब आ गई, उसने कभी नही सोच था कि मानव तस्करी और बंधुआ मजदूरी के फेर में पड़ जाएगी।

दीपशिखा के पंजाब पहुंचते ही युवती ने अपने तेवर बदल डाले। युवती ने अपने भाई राकेश के साथ दीपशिखा की जबरदस्ती शादी करवा डाली, जबकि दीपशिखा बराबर शादी का विरोध कर रही थी। शादी के बाद दीपशिखा की हिम्मत ही टूट गई कि वो अपनी आजादी की जिंदगी खुद के बल पर आराम से जी सके।

युवती के भाई राकेश ने पति होने का वो फ़र्ज़ निभाया कि दीपशिखा को पंजाब के हर मर्द से नफरत होने लगी। ईश्वर में विश्वास करने वाली नास्तिक बन गई। राकेश के जुल्म और सितम से दीपशिखा टूट चुकी थी। हर रोज राकेश ने अपनी मनमानी कर दीपशिखा से जबरदस्ती उसकी इच्छा के खिलाफ काम लिया।

दिनभर मोमोज़ का काम और रात में बलात्कार को झेलने वाली दीपशिखा ने कई बार राकेश से अपने काम का दाम लेने के लिए संघर्ष जारी रखा, किन्तु राकेश से पिटने के अलावा दीपशिखा के जिंदगी में कुछ नहीं बचा। जब राकेश की हवस का शिकार बनी दीपशिखा गर्भवती हो गई तो भी राकेश को दया नहीं आई। राकेश ने पीट—पीटकर उसका गर्भपात कर दिया। दीपशिखा राकेश की गुलाम बन कर रह गई। 10वीं तक पढ़ी-लिखी दीपशिखा ने किसी तरह वापस अपनी मौसी एवं जानकारों से सम्पर्क साधा।

नेशनल कैंपेन कमेटी फ़ॉर इरेडिकेशन ऑफ बोंडेड लेबर को जानकारी मिली कि किसी महिला को सिलीगुड़ी से पंजाब में ट्रैफिकिंग के जरिये ले जाया गया है और बंधुआ बनाकर काम कराया जा रहा है। संगठन ने महिला से संपर्क कर पठानकोट प्रशासन को शिकायत भेज कर टीम पीड़िता की मुक्ति के लिए पठानकोट भेजी।

23 अगस्त को नेशनल कैंपेन कमेटी फ़ॉर इरेडिकेशन ऑफ बोंडेड लेबर के कन्वेनर निर्मल गोराना, ह्यूमन राइट्स लॉ नेटवर्क की अधिवक्ता हरिनी रघुपति, लाल झंडा लेबर यूनियन के शिव लाल, DSP rural दविंदर सिंह, प्रीतम लाल SHO-NJ Singh की टीम ने दीपशिखा को जनियाल गांव में मोमोज़ की दुकान से मुक्त कराया। पुलिस ने बयान लिखे, जिसमें जनियाल के अपने आपको सरपंच बताने वाले व्यक्ति ने दर्ज होते बयान में दखलअंदाजी की। पुलिस ने संबंधित थाने में FIR दर्ज कर ली है।

पीड़िता को आज 24 अगस्त को 164 के बयान दर्ज कराने के लिए मजिस्ट्रेट के पास एवं मेडिकल के लिए राजकीय चिकित्सालय लाया गया है। पीड़िता ने SDM पठानकोट, तहसीलदार, सहायक श्रम आयुक्त एवं अन्य मेंबर्स के सम्मुख उपस्थित होकर बयान दर्ज करवाये।

ऐसे मे पीड़िता को उसकी बकाया पूरी मज़दूरी दिलाने, उसको मुक्ति प्रमाणपत्र जारी कर उसके निवास स्थान पर पुलिस सुरक्षा के साथ भेजने और 20000/-रुपये की सहायता राशि तत्काल जारी करने की जिम्मेदारी पंजाब सरकार की बनती है। इन हालातों में शासन—प्रशासन को इसे बखूबी निभाना चाहिए, मगर प्रशासन अपने हाथ पीछे खींच रहा है। पीड़िता अब भगवान भरोसे छोड़ दी गई है।

Anil Anup

Anil Anup

राज्य ब्यूरो प्रभारी पंजाब, हिमाचल, हरियाणा और जम्मू-कश्मीर l

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