हिन्दी विश्व में सबसे ज्यादा समझी जानेवाली भाषा है…

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विश्व की सर्वाधिक बोली और समझे जानेवाली भाषा में हिन्दी दूसरे स्थान पर है,पहला स्थान चीन में बोली जाने वाली भाषा है… 
अनिल अनूप

हिंदी भाषा विश्व में चीन के बाद सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा है। भारत और विदेशों में करीब 50 करोड़ लोग हिंदी बोलते हैं तथा इस भाषा को समझने वाले लोगों की संख्या करीब 90 करोड़ है। सूचना प्रौद्योगिकी के इस युग में हिंदी का प्रचार-प्रसार खूब फलता-फूलता दिख रहा है। इंटरनेट पर हिंदी सामग्री का बाजार हर वर्ष 95 प्रतिशत बढ़ रहा है। 90 करोड़ लोगों तक पहुंचने के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियां गांव-कस्बों तथा छोटे शहरों में अपने पैर पसारने लगी हैं। यही कारण है कि आज अंग्रेजी भाषा के साथ-साथ अच्छी हिंदी जानने वाले जानकारों की मांग भी बढ़ रही है। एक अनुमान के मुताबिक वर्ष 2021 तक देश में हिंदी भाषा इंटरनेट उपयोग करने वालों की संख्या अंग्रेजी भाषा प्रयोग करने वालों से अधिक हो जाएगी। इंटरनेट वेबसाइट कंपनियां जैसे अमेजन, वॉल-मार्ट, सर्च इंजन गूगल भी वर्तमान में इंटरनेट पर हिंदी में कंटेंट उपलब्ध करवाने का भरसक प्रयास कर रहे हैं। आंकड़ों के मुताबिक देश में वर्तमान इंटरनेट पर हिंदी भाषा वाले कंटेंट को ब्राउज करने वालों की संख्या लगभग 39 प्रतिशत हो चुकी है। इससे पता चलता है कि हिंदी प्रयोगकर्ताओं के लिए भविष्य में इंटरनेट की मार्केट अनेक अवसर पैदा करेगी। भारत में गूगल के एमडी राजन आनंदन का मानना है कि इंटरनेट यूजर्स की अगली पीढ़ी ग्रामीण भारत से होगी। इसलिए इंटरनेट कंपनियों को अंग्रेजी के साथ-साथ हिंदी व क्षेत्रीय भाषाओं में भी तेजी से कार्य करना होगा। 18-20 अगस्त, 2018 को मॉरीशस में आयोजित ‘अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन’ के अवसर पर प्रौद्योगिकी संबंधी सत्रों में इंटरनेट पर बढ़ती हिंदी की गरिमा पर गहन विचार-विमर्श किया गया।

निष्कर्ष के तौर पर उम्मीद जताई जा रही है कि मॉरीशस के हिंदी उत्थान सत्रों में की गई अनुशंसाओं द्वारा हिंदी का मार्ग इंटरनेट की दुनिया पर सजगता से प्रशस्त होगा। ध्यातव्य है कि मॉरीशस में 75 फीसदी भारतीय मूल के लोग हैं, इसलिए मॉरीशस को ‘लघु भारत’ भी कहा जाता है। मॉरीशस में विश्व हिंदी सम्मेलन का केंद्रीय सचिवालय है, जहां से विश्व हिंदी समाचार का प्रकाशन होता है। पिछले कुछ समय से यूनिकोड फोंट की उपलब्धता के कारण हिंदी में चैट, गप-शप, ईमेल, ई-शिक्षण, मल्टीमीडिया की सुलभता के कारण हिंदी की लोकप्रियता बढ़ी है, लेकिन यूनिकोड की उपलब्धता के बावजूद वर्तमान में भी हिंदी सामग्री में स्पेलचेकर, सर्च जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी खलती है। गूगल वॉइस रिकार्डिंग ने जहां टाइपिंग से निजात दिलाई है, वहीं दूसरी ओर वॉइस रिकार्डिंग में अनेक त्रुटियां विद्यमान हैं, जो वाक्य की वास्तविक परिभाषा को ही बदल देती हैं। आवश्यकता है इन आधारभूत त्रुटियों को दूर करने के लिए इंटरनेट टूल्स को अधिक धारीदार बनाया जाए। हमारे देश में हर वर्ष 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाता है। महज 1 दिन हिंदी में भाषण, निबंध, नारेबाजी तथा समाचार पत्रों में सुर्खियां देखने को मिलती हैं। उसके बाद 364 दिन हमें अंग्रेजी में ही राग सुनना व पढऩा पड़ता है। भारत की सबसे बड़ी कमजोरी भी यही है कि हम सिर्फ किसी दिवस को एक दिन तक ही सीमित कर देते हैं। आजादी के सात दशक बाद भी हिंदी को समस्त भारत की सर्वसम्मति से राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने में हम सफल नहीं हो पाए हैं।

मॉरीशस में 75 फीसदी भारतीय मूल के लोग हैं, इसलिए मॉरीशस को ‘लघु भारत’ भी कहा जाता है। मॉरीशस में विश्व हिंदी सम्मेलन का केंद्रीय सचिवालय है, जहां से विश्व हिंदी समाचार का प्रकाशन होता है। पिछले कुछ समय से यूनिकोड फोंट की उपलब्धता के कारण हिंदी में चैट, गप-शप, ईमेल, ई-शिक्षण, मल्टीमीडिया की सुलभता के कारण हिंदी की लोकप्रियता बढ़ी है, 

मातृभाषा के महत्त्व को समझना हो, तो एशिया में ही जापान और चीन की शैक्षणिक गतिविधियों व सरकारी कामकाज को देखा जा सकता है। एशिया महाद्वीप के दोनों देश तेज विकास के लिए जाने जाते हैं। इनके विकास के पीछे मातृभाषा का महत्त्व रीढ़ की हड्डी की भूमिका निभाता है। वर्तमान भारत में डिजिटलाइजेशन के सपने को धरातल तक पहुंचाने के लिए राष्ट्रीय हिंदी दिवस को सूचना प्रौद्योगिकी के साथ जोडक़र समृद्ध बनाना होगा। स्मार्टफोन के संचालन में यदि हिंदी भाषा अपनी पकड़ मजबूत कर देती है, तो भारत के हर गांव-कस्बे में हिंदी भाषा की गरिमा व भविष्य में रोजगार की अपार संभावनाओं को पकड़ा जा सकता है। पिछले डेढ़ दशक से मैं सूचना प्रौद्योगिकी का प्रशिक्षु तथा व्यवसायी हूं, हिंदी की जितनी लोकप्रियता मैंने पिछले दो वर्षों में इंटरनेट पर देखी है, इससे पहले कभी नहीं देखी थी। हमारे देश की एक बहुत बड़ी समस्या यह है कि हमारी शिक्षा प्रणाली दो भागों में बंटी हुई है, एक कान्वेंट स्कूलों में तथा दूसरी सरकारी स्कूलों में। अध्ययनरत विद्यार्थियों की वेशभूषा, अध्ययन प्रक्रिया में अनेक अंतर हैं। कान्वेंट स्कूल का विद्यार्थी हिंदी से कोसों दूर चला गया है, इसके विपरीत हिंदी स्कूल का विद्यार्थी अंग्रेजी से कोसों दूर है। इस बढ़ती खाई को पाटने के लिए कठोर कदम उठाने होंगे। यह आधारभूत सत्य है कि मानव अपनी जन्मभूमि तथा मातृभाषा में ही सहज महसूस करता है। भारत जनसंख्या के आधार पर विश्व का दूसरा सबसे बड़ा देश है। इसी जनसंख्या के कारण पूरी दुनिया भारत की मार्केट पर नजरें टिकाए हुए है। भारत में बेरोजगारी तीव्र गति से बढ़ रही है, इस पर लगाम लगाने के लिए मातृभाषा में रोजगार के उभरते नवीन अवसरों में कौशलता पर ध्यान देना अति आवश्यक है। अत: जितना संभव हो सके अपनी भाषा में हिंदी का समावेश सुनिश्चित करें, ताकि हिंदी की बुझती हुई लौ को पुन: जलाया जा सके।

Anil Anup

Anil Anup

राज्य ब्यूरो प्रभारी पंजाब, हिमाचल, हरियाणा और जम्मू-कश्मीर l

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