सीबीआई की विश्वसनीयता पर उठते सवाल..

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सलीम रजा :-देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी सीबीआई के दो सीनियर अधिकारियों राकेश अस्थाना और आलोक वर्मा के बीच जिस तरह से आरोप-प्रत्यारोपों की जंग छिड़ी हुई है। उससे सीबीआई की विश्वसनीयता पर सवाल उठने शुरू हो गये हैं। यह तो सर्वविदित है कि जांच एजेन्सी अपना वजूद क्या रखती है। देश के करोड़ों लोगों को इस जांच एजेंसी पर कितना भरोसा है। देश में न जाने कितने संगीन आपराधिक मामलों में लोगों का यकीन इस एजेसी की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर आकर टिक जाता है। लेकिन जो सूरते हाल मौजूदा समय में चल रहे हैं, उससे उन लोगों की उम्मीदों पर बज्रपात तो गिरा ही है, साथ ही विश्व मानचित्र पर सीबीआई सरीखा बड़ी जांच एजेंसी ने अपनी छवि को भी धूमिल किया है। आलम ये है कि देश के उन बुद्धिजीवी वर्ग की पेशानी पर चिंता के भाव साफ देखे जा सकते हैं। जिनका यकीन और यकीदा सीबीआई पर था। देश में बहुत सारे विभाग हैं, जिनमें बड़े ओहदेदारों के बीच जंग छिड़ी है। ऐसा कई बार देखा गया है, लेकिन जिस तरह से सीबीआई के दो बड़े ओहदेदारों की ईमानदारी के कारण गैंगवार चल रही है। हालात यहां तक पहुंच गये हैं कि अधीनस्थ ने अपने सीनियर पर रिश्वत खोरी का इल्जाम लगाया, वहीं सीनयिर ने अपने अधीनस्थ को अपना रसूख दिखाते हुये उल्टे रिश्वतखोरी का इल्जाम ही नहीं लगाया बल्कि बाकायदा रिपोर्ट भी लिखाई है। अब चूंकि मामला अदालत में पहुंच गया है, जिससे इस जांच एजेन्सी की आग राजनीति तक पहुंच गई है। जिसके चलते इस जांच एजेंसी की कार्यशैली, उसकी पारदर्शिता, निष्पक्षता पर बहुत सारे सवाल खडे हो गये हैं। कहीं न कहीं इस पूरी जंग में राजनीतिक संलिप्तता जरूर उजागर होती है। उसका कारण ये है कि जब आलोक वर्मा ने अपने अधीनस्थ राकेश अस्थाना पर कई संगीन इल्जाम लगाये थे। जिसकी जांच के लिए बाकायदा उन्होंने सतर्कता विभाग को खत भी लिखा था। ये बात अलग थी कि उन्होंने उसके लिए अनुमति नहीं ली थी, जबकि ऐसा करना जरूरी था। बावजूद इसके राकेश अस्थाना को प्रोन्नत किया गया। अगर इस बात का पहले ही से संज्ञान ले लिया गया होता तो शायद इस एजेन्सी की इतनी बड़ी फजीहत नहीं होती। इस वक्त जो दौर चल रहा है, उसमें पांच प्रदेशों में विधान सभा चुनाव की प्रक्रिया चल रही है, उसके बाद देश में लोकसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में सीबीआई के दो सीनियर अफसरान के बीच चल रही गैंगवारी की आंच उसकी नियंत्रक राजनैतिक प्रतिष्ठान पीएमओ को अपनी जद में लपेटने की ताकत रखती है। वहीं पूर्व में हुये कई बड़े घोटालों में सीधे-सीधे विपक्ष सरकार पर निशाने साध रही है। ऐसे में सीबीआई में मचे घमासान ने देश के सर्वोच्च कार्यालय पर भी ढ़ेर सारे सवाल खड़े कर दिये हैं। हाल ही के महीनों में देश के अन्दर नीरव मोदी, मेहुल चोकसी, विजय माल्या और अगुस्ता हैलीकाप्टर खरीद घोटाले जैसे मामले की जांच सीबीआई के पास हैं। सवाल ये उठता है कि जो खुद ही जांच के दौर से गुजर रहे हैं, ऐसे में खुद भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना करते हुये कैसे कोई अधिकारी भ्रष्टाचार के मामले की जांच करने के लिए नैतिक क्षमता रखता हो। ये सबसे बड़ा सवाल तो है ही, साथ ही बहस का विषय भी है। बहरहाल, दोनों अधिकारी एक-दूसरे पर रिश्वत लेने का इल्जाम जड़ रहे हैं और मामला अदालत तक जा पहुंचा है। अब रिश्वत किसने ली या नहीं ली, ये बात सबूत और गवाह पर टिकी हुई है। लेकिन जिस तरह से आलोक वर्मा ने राकेश अस्थाना पर संगीन इल्जाम लगाया है। उसके कई मायने हैं, क्योंकि राकेश अस्थाना गुजरात काडर के आईपीएस अधिकारी हैं और उन्हें नरेन्द्र मोदी के साथ काम करने का एक लम्बा अनुभव भी है। गाहे-बगाहे ये बात भी चर्चाओं में है कि अस्थाना मोदी के पसंदीदा अफसरों में से हैं। ऐसे हालात में जब सीबीआई सीधे तौर से प्रधानमंत्री की मातहती में काम करती है। इसलिए इसके अन्दर मचा घमासान मोदी जी के लिए भी एक बड़ी चुनौती है। अगर वे इस घमासान को संभाल पाने में असमर्थ रहते हैं तो निश्चित इस एजेन्सी की कार्यक्षमता पर बुरा असर पड़ेगा। बहरहाल, इस द्वंद युद्ध को रोकना प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। प्रधानमंत्री को सीधे-सीधे इस मामले में हस्तक्षेप करके सही और गलत का संज्ञान लेना चाहिए जो गलत हो उसे बाहर का रास्ता दिखा देना चाहिए। वरना सीबीआई के अन्दर मचा ये घमासान सीधे-सीधे मोदी जी के राजनैतिक वर्चस्व को प्रभावित करेगा, इसमे कोई दो राय नहीं।

Prem

Prem

Sud-Editor

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