दून की सड़कों पर डेथ वारंट लेकर घूम रही आवाम

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सलीम रजा :- देहरादू देवभूमि उत्त्राखण्ड में इस समय जो हाल है वो किसी से छिपा नहीं है। चारों तरफ कूड़े के ढ़ेर बयां कर रहे हैं कि इस देवभूमि की राजधानी का कोई भी गहाकू नहीं है। कहते हैं न कभी-कभी पात्रों के चयन में उन का भी ध्यान आ जाता है, जो मूक हैं, बधिर हैं, निर्जीव हैं, वो कुछ कहना तो चाहते हैं लेकिन वो क्या कह रहे हैं। ये उन लोगों का दायित्व बनता है, जो इन मूक बधिरों के केयर टेकर है। केयर टेकर का फर्ज है कि उनके नित्य कार्यों को समय से करें। इससे उनकी सुन्दरता तो बनी रहेगी साथ ही उनके अन्दर ये भाव नहीं पैदा होंगे कि इतने बड़े परिवार का सदस्य होने के वावजूद भी वो अनाथ की तरह है। ऐसा न होने की वजह से उनके अन्दर एक हीन भावना घर कर जाती है कि मेरे सामने से गुजरने वाले इतने स्वार्थी है कि उनको उसकी दुर्दशा नहीं दिख रही।
अपने गुरूर में वो ये भी भूल जाते हैं कि उनका अस्तित्व मेरे उपर निर्भर है। अगर मेरे अस्तित्व पर खतरा मंडराया तो उनका वजूद स्वतः समाप्त हो जायेगा। अगर कोई उसकी बदहाली से दुःखी होकर आगे बढ़ता भी है तो वो एक नहीं, दो नहीं बल्कि असंख्य लोगों की आंखों की किरकिरी बन जाता है। मैं यह व्यथा उसकी सुना रहा हूं, जो अपना परचम विश्व मानचित्र पर फहराता है। जी हां…! मैं उत्तराखण्ड की अस्थाई राजधानी देहरादून की बात कर रहा हूं।
देवभूमि के उस मंडप की जिसको सजाने संवारने की जिम्मेदारी के लिए एक बहुत बड़ा अमला लगा हुआ है। इस कड़ी में मुझे याद आया कि कई शहर ऐसे भी है, जहां सोता हुआ व्यक्ति प्रवेश मात्र से बता देता था कि अमुक शहर है। आज वही हाल देवभूमि के शहर देहरादून का है। जहां पर शिक्षित दून-सुन्दर दून स्वच्छ दून -हरा दून जैसे स्लोगन अपनी पहचान बनाने के लिए बना दिये गये हों, लेकिन उसके अनुरूप कुछ भी देखने को ना मिले तो इन स्लोगनों को लिखने का क्या औचित्य।
दून शिक्षित ज़रूर है लेकिन नशे के प्रभाव ने इस को ग्रहण लगा दिया। सुन्दर दून तो आप शहर के अन्दर प्रवेश करते ही देख लेंगे। शहर के हाई-वे से लेकर मेन सड़कों को मिलाकर गली-मुहल्ले की सड़कों को देखे तो कोई सड़क ऐसी नहीं मिलेगी, जिसमें छोटे से लेकर बड़े गड्ढे ना हों। आये दिन होने वाले सड़क हादसों में न जाने कितने लोग अपनी जान गवां चुके हैं लेकिन हालात जस के तस हैं सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही वहीं स्वच्छ दून एक ऐसा स्लोगन है, जो लोगों को अपनी ओर अट्रेक्ट करता है। लेकिन पूरे शहर में ऐसी कोई जगह नहीं है, जहां पर गन्दगी का साम्राज्य ना हो। यानि दुख की बात है कि स्वच्छ सर्वेक्षण अभियान की किस तरह से धज्जियां उड़ती हैं, आप स्वयं देख सकते हैं। सफाई व्यवस्था चरमराई हुई है, नालियों का पानी सड़कों पर है। सड़कों पर सफाई ना के बराबर है।
जिस रास्ते से गुजर जायें, दुर्गन्ध से आप अपनी नाक पर रूमाल रखना नहीं भूलेंगे। हरा दून तो दून में हरियाली भी विलुप्त होती जा रही है। जंगल अपने बृहद क्षेत्रफल से सिकुड़ते जा रहे हैं। उनका दोहन निरंतर जारी है। कर्मचारियों को शहर की फिक्र कम अपने हाकिमों की परवाह ज्यादा है। मेरा कहने का तात्पर्य ये है कि जिस प्रदेश की राजधानी सजी संवरी न हो, वहां पर बैठने वालों की निर्लज्ज नज़रों को देखकर भी लाज नहीं आती।
जिस जगह पर देश दुनिया से लाखों की तादाद में सैलानी आते हों, उस शहर की आभा पर गन्दगी का ग्रहण लगाने में ये पूरा अमला दोषी है। यही व्यथा है इस अस्थाई राजधानी देहरादून की जिसमें शहर प्रवेश के साथ ही गन्दगी और दुर्घटनाओं को न्योता देती हुई सड़के हों। राजधानी आन्दोलनों की आग में झुलस रही हों और ज्वलंत मुद्दे हवा में तैर रहे हों। त्रासदी का दंश आज भी लोग झेल रहे हों।
जहां अपने हक के लिये अपने ही घर के बच्चे अपने लोगों के खिलाफ विद्रोह पर उतरने के लिये मजबूर हों। उस प्रदेश का मुखिया नीरो की तरह है कि शहर जल रहा है और नीरो वंशी बजा रहा है । डबल इंजन की सरकार का दंभ भरने वाली सरकार के सामने चुनौतियों का अंबार हो। ऐसे में शहर की बदहाली को देखे कौन। मैं तो यही कहूंगा जिसके इतने सारे केयर टेकर हों ओर वो शहर गन्दगी की दुर्गन्ध से सिसक रहा हो तो लाजमी है कि प्रदेश के मुखिया के साथ-साथ तमाम अधीनस्थ कर्मचारी कोमा में हैं जो न सुन पा रहे हैं और न देख पा रहे हैं इन्हीं लोगों की देन है कि उत्तराखण्ड की अस्थाई राजधानी देहरादून गन्दगी का दंश तो झेल ही रही है साथ ही लोगों को सड़कों में गढढे देखकर ये कहना मुश्किल है कि सड़कों में गढढे हैं या गढढों में सड़क बहरहाल आलम ये है कि सडकों पर सफर करने वालों को यमराज का डेथ वारंट जरूर मिल जाता है ।

Prem

Prem

Sud-Editor

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