विज्ञापन के दौर में सही ख़बरों की इच्छा न करें

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चुनावी सहालग आते ही पुछलग्गू नेताओं और कलमचोर पत्रकारों की चांदी हो जाती है. यहाँ बात सिर्फ ब्लॉक स्तर के पत्रकार की ही नहीं की जा  रही बल्कि राजधानी के पॉश एरिया के एसी   न्यूज रूम में बैठे सम्पादकों की भी हो रही है. राजनीतिक पार्टियां मीडिया सेटअप में लगी हुईं है. छोटे से लेकर बड़े अख़बार, न्यूज चैनल और मौसमी न्यूज पोर्टल्स भी चुनावी वैतरिणी में डुबकी लगाने से नहीं चूक रहे हैं.

दूसरी ओर देश की जनता ने भी अपने मनपसंद चैनलों/अख़बारों/न्यूजपोर्टल्स को चुन लिया है. आज देश की जनता को “खबर” सुनना या देखना  पसंद नहीं बल्कि “जनता” “अपने मन की खबर”  देखना या सुनना पसंद करती है .मीडिया के बाजारवाद ने जनता के दिमाग को हाईजैक कर लिया है. “जनता” को लगता है कि वह, वहीँ देख या सुन रही है जो वह देखना या सुनना चाहती है, लेकिन असलियत यह है कि बाजारवादी मीडिया जो चाहती है वही जनता सुनती देखती या पसंद करती है.

यहीं से शुरुआत होती है “फेक या पेड न्यूज” की. दर-असल- राजनीतिक पार्टियों ने मीडिया की मदद से देश की “जनता” को ही ख़त्म कर दिया है. आप चिराग लेकर निकल जाईये गांव -गली-क़स्बा शहर छान मारिये लेकिन पूरे देश में आपको एक भी “जनता” नहीं मिलेगी. आज आपको गाँव के चौपाल से लेकर संसद के गलियारों तक सिर्फ और सिर्फ “भाजपाई. कोंग्रेसी, सपाई, बसपाई, वामी, हिन्दू मुसलमान” ही मिलेंगे. देश से “जनता” ख़त्म हो चुकी है.

अब खबरे भी धर्म और राजनीतिक तुष्टि को ध्यान में रखकर लिखी जाती है. क्यूंकि सम्पादकों को पता है कि हिन्दू  मुस्लिम विरोधी खबर ढूंढते है  मुस्लिम हिन्दू विरोधी. यही  भाजपाई, कांग्रेसी  अन्य राजनीतिक समर्थकों का भी है. सरकारी विज्ञापनों की मलाई खाने के लिए अख़बार और न्यूज चैनल कुछ भी लिखते दिखाते है. अब हैडलाइन से लेकर क्लाइमेक्स तक सम्पादक के ऑफिस में नहीं बल्कि किसी राजनीतिक पार्टी के दफ्तर में लिखे जाते हैं.

ब्लॉक स्तर के कुछ  कलमचोर पत्रकार  सरकारी अध्यापकों, ग्राम प्रधानों कोटेदारों अवैध व्यापारियों, बालू माफियाओं को खबर निकालने का भय दिखाकर गुलाबी चांदी काट कर इनकी कमियों और काले कारगुज़ारियों पर पर्दा डालते हैं.इसके इतर राजधानी में बैठे ज्यादातर संपादक भी  राजनीतिक पार्टियों की दया से विदेशी मदिरा का पान करके “जो तुमको हो पसंद वही खबर लिखेंगे” का राग अलापते हैं.

“फेंकू युग” में “फेंकू कृपा” से सम्पादक “दम’ लगाकर “न्यूज फेक” रहें है. तो सौ की सीधी बात यह है की विज्ञापन के दौर में सही ख़बरों की इच्छा न करें.

-संतोष “प्यासा”

 

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