यूपी में आदमी पार्टी की एंट्री : ये वक्त ख़ुशी मनाने का नहीं रणनीति बनाने का है.

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(संतोष “प्यासा” )

अगर आम आदमी पार्टी चाहती है कि भविष्य के चुनावी दंगल में वो अपने दिग्गज विरोधी पार्टियों को पटखनी दे तो उसके लिए इन बातों का ध्यान रखना बहुत जरुरी है.

राजनीती के नज़रिये से उत्तर प्रदेश हमेशा से ही महत्वपूर्ण माना जाता रहा है. कहा जाता है कि देश में राजनितिक दलों के भाग्य का फैसला यूपी की हार जीत से ही तय होता है.

जिस तरह से उत्तर प्रदेश में “आप” ने एंट्री की है वह वाकई कबीले-तारीफ है. गौर-तलब हो कि आम आदमी पार्टी ने यूपी निकाय चुनाव में 2 नगर पंचायत अध्यक्ष, 3 नगर निगम पार्षद, 14 नगर पालिका परिसद सदस्य एवं 19 नगर पंचायत सदस्य पद के साथ अपने लिए सकारात्मक किन्तु चुनैतीपूर्ण विजय हासिल की है. लेकिन यह समय “आप” के लिए जीत की ख़ुशी मनाने से ज्यादा महत्वपूर्ण भविष्य की रणनीति बनाने का है.
अगर आम आदमी पार्टी चाहती है कि भविष्य के चुनावी दंगल में वो अपने दिग्गज विरोधी पार्टियों को पटखनी दे तो उसके लिए इन बातों का ध्यान रखना बहुत जरुरी है.

1.प्रदेश में तीसरी या दूसरी महत्वपूर्ण राजनितिक दल में तब्दील होने का मौका :- बीजेपी के आने से पहले राज्य में 2 ही प्रमुख राजनितिक दल थे, जिनमे से एक सपा व दूसरी बसपा थी. लेकिन बीजेपी के राज्य में प्रवेश करते ही बसपा तीसरे नंबर पर पहुँच गयी. हालिया निकाय चुनाव के नतीजों ने सपा को मायूस किया लेकिन बसपा के लिए एक नई उम्मीद जगा दी है. अगर “आप” अपनी रणनीति को सुचारु रूप से स्थापित कर लेती है तो वह प्रदेश कि दूसरी या तीसरी महत्वपूर्ण राजनितिक दल का ओहदा पा सकती है.

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2.सपा-बसपा की स्थिति का फायदा :- निकाय चुनाव के नतीजों ने भले ही बसपा को उम्मीद झलक दिखा दी हो, लेकिन प्रदेश में बसपा की हालत बदतर है. बसपा सुप्रीमो मायावती का चार्म अब फीका पड़ चुका है. इसके अलावा सपा की स्थिति भी नाजुक बनी हुई है. भले ही सपा पारिवारिक कलह से सुलह तक पहुँच गयी है. लेकिन पार्टी की स्थिति अभी तक मजबूत नहीं हो पाई. आम आदमी पार्टी को इन दोनों पार्टियों के इस स्थिति का भरपूर फायदा उठाना चाहिए. पारिवारिक उलझनों की वजह से सपा के कार्यकर्ताओं का मनोबल टूट चुका है, (जो की सपा की हार का मुख्य कारण है) सपा का अधिकतम समय और ऊर्जा कार्यकर्ताओं में सामंजस्य बनाने में चला जायेगा, वहीँ बसपा सुप्रीमो मायावती अपना समय जनता का विस्वास पुनः जीतने में लगा देंगीं. ये समय आम आदमी पार्टी के सुनहरा समय साबित होगा. “आप” बिना प्रतिस्पर्धा की चिंता किये पार्टी के सुदृणीकरण हेतु कार्य कर सकती है.

3.वर्चस्व की लड़ाई से बचें :- किसी भी राजनितिक पार्टी के पतन का मुख्य कारण वर्चस्व लड़ाई ही होती है. वर्चस्व की लड़ाई ने ही सपा-बसपा की नैया डुबाई है, हालाँकि वर्चस्व और अहम् का खट्टापन आम आदमी पार्टी में भी देखने को मिलता है, लेकिन अगर “आप” राजनीती में “अंगद का पाँव” बनना चाहती है तो उसे वर्चस्व की लड़ाई से दूर रहने होगा.

4.जमीनी स्तर पर सक्रियता :-  जमीनी स्तर पर असंवेदनशील एवं उदासीन रवैये की वजह से ही हालिया निकाय चुनाव में सपा-बसपा को मुंह की खानी पड़ी है. वहीँ बीजेपी ने जमीनी स्तर की सक्रियता को गंभीरता से लिया. यही वजह है कि स्वम मुख्यमंत्री योगी ने 40 जन सभाएं की.
आम आदमी पार्टी को अभी से ही जमीनी स्तर कि रणनीति बनाकर कार्य शुरू कर देना चाहिए.
जिसकी शुरुआत आम आदमी पार्टी मासिक या साप्ताहिक स्तर पर पार्टी मीटिंग या जन समूह को पार्टी के लक्ष्य / उद्देश्य बता कर सकती है.
5.एकल वर्ग की मानसिकता का त्याग :- सभी राजनितिक पार्टियों को इस ओर ध्यान देना चाहिए. किसी भी पार्टी द्वारा किसी वर्ग विशेष की अगुवाई करने से फायदे के साथ नुकसान भी उठाना पड़ता है. जिसका सबसे सटीक प्रमाण बसपा की स्थिति को देख कर लगाया जा सकता है. आज की जनता का अधिकांश हिस्सा युवा वर्ग है. आजका युवा जाति धर्म या गुट की राजनीती से दुरी बनाकर चलना पसंद करता है. मायावती के ऊपर “दलित” सिम्बल लग चुका था, जो लगातार उनकी हार का कारण बना. इसके विपरीत भाजपा ने अपनी सूझ बूझ से “सबका साथ, सबका विकाश” की बात शुरू कर दी जिसके नतीजे सबके सामने हैं.

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6.माने न माने लेकिन बात जरूर सुने :- राजनितिक पार्टियों को सबसे ज्यादा नुकसान तब पहुँचता है जब पार्टी का कोई दिग्गज नेता पार्टी का दामन छोड़ कर दूसरे का दामन थाम लेता है. ज्यादातर मामलों ये देखा गया है कि पार्टी का साथ छोड़ने वाले अधिकतम कद्दावर नेताओं ने यही शिकायत की , कि पार्टी उनकी बात नहीं सुनती है.
अभी हाल ही में “आप” के विशेष नेता कुमार विश्वास ने भी यही आरोप लगाया है. “आप” को हर संभव प्रयाश करके बात न सुनने कि प्रवत्ति से बचना चाहिए.

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