कब तक पड़ा रहेगा कश्मीर कोर्ट में!! 

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अनुच्छेद 35ए राज्य सरकार को विशिष्ट शक्ति देता है कि वह स्थायी नागरिकों की परिभाषा तय कर सकती है तथा उसने इस धरती पर जन्मे लोगों को पीआर के रूप में परिभाषित किया है। जैसा कि भारतीय संविधान स्थापित करता है, यह उसी तरह होना चाहिए था, किंतु इसे 1954 में लागू किया गया….
-अनिल अनूप 
सुप्रीम कोर्ट ने फिर से संविधान के अनुच्छेद 35ए पर सुनवाई रोक दी है तथा इस तरह यह मसला अभी भी लटका हुआ है, जबकि घाटी व सीमांत क्षेत्रों में गोलियों की आवाज अभी भी सुनी जा रही है। हमें आशा करनी चाहिए कि यह मामला राम मंदिर मामले की तरह साबित नहीं होगा जहां न्यायपालिका कोई फैसला देने से बच रही है। समलैंगिक यौन संबंधों के मामले भी ऐसा ही हो रहा था, परंतु अब इस विवादास्पद और संवेदनशील मसले पर फैसला आ जाने से आशा की किरण जगी है। कानून बनाना फिसलती जमीन जैसा मामला रहा है क्योंकि व्याख्या भी कानून का नया नजरिए पेश करती है जैसे कि प्रशासकीय निर्णय की अलग प्रक्रिया में होता है। अनुच्छेद 35ए की व्याख्या में सुप्रीम कोर्ट ने संवैधानिक नैतिकता की बात की तथा याचिकाकर्ताओं को इसे दायर करने की अनुमति दी जो कि पिछले वर्षों में एक नैतिक व वैधानिक पथभ्रष्टता मानी जाती थी। यह स्पष्ट था कि नैतिकता व कानून एक चीज नहीं थी तथा जिसकी अनुमति दी गई वह वैधानिक रूप से अनुमति थी, जबकि नैतिकता का निर्णय समाज तथा लोगों के विश्वास के आधार पर किया जाता है। जैसा कि अनुच्छेद 370 या 35ए के मामले में था, कश्मीर केस का नजरिया लेने के लिए वहां कोई दुविधा नहीं है। निश्चित रूप से इसकी राजनीतिक व धार्मिक पेचीदगियां हैं। लेकिन यह आशा नहीं की जाती है कि सुप्रीम कोर्ट धार्मिक या राजनीतिक सीमाओं से सीमित है, हालांकि उसे भारतीय संविधान तथा दूसरी ओर जम्मू-कश्मीर के अपने संविधान की भावनाओं का सम्मान करना है। जैसा कि इससे पहले सुप्रीम कोर्ट खुद ही कह चुकी है कि जम्मू-कश्मीर का संविधान राष्ट्रीय संविधान के अधीन आता है।
पंचायत चुनाव के बहिष्कार की फारूक अब्दुल्ला की धमकी तथा इसी प्रकार की अन्य धमकियां सुप्रीम कोर्ट की कार्यप्रणाली में बाधक नहीं बननी चाहिए। यह समझने योग्य है कि फारूक अब्दुल्ला सोचते हैं कि यह उनके परिवार के सम्मान का मामला है क्योंकि उनके पिता ने तत्कालीन प्रधानमंत्री से सुलह वार्ता की थी तथा इसे उनकी सबसे बड़ी ट्रॉफी के रूप में माना। इस बात में कोई संदेह नहीं कि शेख अब्दुल्ला इस अनुच्छेद 370 के रचनाकार थे जो कि कश्मीर को विशिष्ट दर्जा देता है, लेकिन यह भारत था जिसने अल्प काल के लिए अस्थायी छूट देना स्वीकार किया, जो कि कभी खत्म नहीं हुई। यह भी एक जानी हुई बात है कि तत्कालीन उप प्रधानमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल इसे संविधान में शामिल करने की राह में एक बाधा थे। उन्होंने बाद में कहा कि अगर नेहरू ने उन्हें इजाजत दी होती तो उन्होंने कश्मीर की समस्या को 15 दिनों में हमेशा के लिए हल कर लिया होता। अब यह एक पेचीदा विषय बना हुआ है। यह भी माना जाता है कि बीआर अंबेडकर ने शेख अब्दुल्ला को सीधा जवाब दिया था कि यह सही बात नहीं है कि कश्मीर भारत से सब कुछ ले ले तथा बदले में भारतीय नागरिकों को बराबर का भी अधिकार न दे। इसलिए उन्होंने इस समझौते को नकार दिया था। यह अद्भुत है कि संविधान सभा भंग हो गई परंतु यह अनुच्छेद 370 भंग नहीं हुआ और अब तर्क पेश किया जा रहा है कि यह संविधान का अविभाज्य तथा स्थायी हिस्सा है।
यह केवल सभा के सम्मिलन से ही हटाया जा सकता है। अनुच्छेद 35ए राज्य सरकार को विशिष्ट शक्ति देता है कि वह स्थायी नागरिकों की परिभाषा तय कर सकती है तथा उसने इस धरती पर जन्मे लोगों को पीआर के रूप में परिभाषित किया है। जैसा कि भारतीय संविधान स्थापित करता है, यह उसी तरह होना चाहिए था, किंतु इसे 1954 में लागू किया गया। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से फैसला दिया है कि जम्मू-कश्मीर एक स्वायत्त राज्य नहीं है तथा इसे भारतीय संविधान से बाहर प्रभुसत्ता हासिल नहीं है। अब याचिकाकर्ता ने पक्षपात का प्रश्न उठाया है क्योंकि भारतीय नागरिकों से पक्षपातपूर्ण व्यवहार हो रहा है। यह पक्षपात भारत तथा उसके एक राज्य के बीच नागरिकता को लेकर हो रहा है। उन्हें कश्मीर की सेवा क्यों करनी चाहिए जबकि उन्हें वहां कोई अधिकार हासिल नहीं है। राज्य के कई शैक्षणिक संस्थान, विशेषकर मेडिकल तथा इंजीनियरिंग संस्थान बंद होने के कगार पर हैं, वे ठीक ढंग से काम नहीं कर पा रहे हैं, क्योंकि वहां पर्याप्त फैकल्टी नहीं है। फैकल्टी वहां जाने से इसलिए इनकार कर रही है क्योंकि उन्हें ठीक ढंग से वहां बसने की सुविधा ही हासिल नहीं है। उनके वहां बसने के लिए कोई जगह ही नहीं है। कई भारतीय डाक्टरों ने प्रश्न किया है कि हमें कश्मीरियों का उपचार क्यों करना चाहिए, जबकि वे हमें बराबर का अधिकार ही नहीं देते हैं। महिलाएं भी अपने साथ पक्षपात हुआ मानती हैं क्योंकि उन्हें भी कोई अधिकार हासिल नहीं है। बाद में हाई कोर्ट में एक अपील में छूट का एक हिस्सा शामिल किया गया। यह छूट एक पीढ़ी की छूट थी।
मुख्य आपत्ति यह है कि इसे वैधानिक रूप से न्यायपूर्ण नहीं माना जा सकता क्योंकि राष्ट्रपति के आदेश को कैबिनेट की स्वीकृति या संसद की आज्ञा प्राप्त नहीं है। यह एक तथ्य है कि भारतीय संविधान में तब तक कोई संशोधन नहीं हो सकता जब तक कि संविधान के अनुच्छेद 368 की व्यवस्थाओं का अनुपालन करते हुए कैबिनेट तथा संसद से स्वीकृति नहीं ली जाती है। अब इसे राष्ट्रपति की अनुमति लिए बगैर ही संविधान से हटाया जा सकता है। हमें एक न एक दिन इस लटके हुए विषय से निपटना ही होगा, भले ही इसके कारण अव्यवस्था सन्निकट हो। राष्ट्रपति के जिस आदेश पर सवाल उठाए जा रहे हैं, उस आदेश को हमें वापस लेना ही होगा। यह भी एक सच्चाई है कि सरकार बिना किसी लंबे प्रोसीजर को अपनाए ही ऐसा कर सकती है। फिर भी सवाल है कि क्या हम ऐसा करेंगे या फिर वर्ष 2019 का इंतजार करना होगा?
Anil Anup

Anil Anup

राज्य ब्यूरो प्रभारी पंजाब, हिमाचल, हरियाणा और जम्मू-कश्मीर l

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