क्यों हो रहे हैं परिवारों से तिरस्कृत बुजुर्ग..

  • 203
  • 100
  •  
  • 10
  •  
  •  
  •  
  •  
    313
    Shares

 

 

 

सलीम रज़ा कहते हैं कि माता-पिता मिलकर अपने पांच बच्चों को पाल लेते हैं। लेकिन पांच बच्चे मिलकर अपने माता-पिता को नहीं पाल पाते हैं। ये विषय थोड़ा रूलाने वाला और चिंतन का जरूर है। ये बात कहावत के रूप में भले ही कही जाती हो, लेकिन आज जो दौर चल रहा है और जो सर्वे रिपोर्ट आई है, वो इस तरफ इशारा करती है कि हम अपने मां बाप को लेकर कितने संवेदनशील हैं। दरअसल, हम बड़े होकर ये भूल जाते हैं कि हमारे माता-पिता की अपनी संतान से कुछ अपेक्षायें होती हैं, उन्होंने भी अपने बच्चों को लेकर अपने भविष्य के लिये कुछ सपने सजायें हैं।
लेकिन जब उनके सपने टूटते हैं तो जो पीड़ा और टीस उनके अन्दर होती होगी या जिस टीस का अहसास उन्हें होता है, उसका अन्दाजा आसानी से नहीं लगाया जा सकता। पहले हम अपने बुजुर्गों की आवाज मात्र से कांप जाते थे लेकिन आज दौर बदल गया। आज की भावी पीढ़ी अपने बुजुर्गों को वो सम्मान नहीं दे पा रही है, जिसकी वो अपेक्षा अपने बच्चों से करते हैं। असल में इसका सबसे बड़ा प्रभाव संयुक्त परिवारों का एकल परिवार में तब्दील होना माना जा सकता है। अगर हम संयुक्त परिवार और एकल परिवार का तुलनात्मक अध्ययन करें तो पायेंगे कि संयुक्त परिवार और एकल परिवार की जीवन शैली में बहुत बड़ा अन्तर है।
दरअसल, संयुक्त परिवार में घर का बड़ा ही मुखिया होता था। जिसकी बात परिवार के हर सदस्य को मानना अनिवार्य था। जिसमें संगठन की झलक दिखाई देती थी लेकिन एकल परिवार में परिवार के अन्दर संगठन नहीं बिखराव देखने को मिलता है। परिवार का हर सदस्य मुखिया का रोल निभाता है, जिससे परिवार में असंतोष की भावना जागृत होती है और परिवार के मुखिया के अन्दर आत्मग्लानी घर कर जाती है। जिससे त्रस्त होकर माता-पिता अपने आप को हीन समझने लगते हैं। उन्हें महसूस होता है कि उन्होंने अपने बच्चों के लिये जितना किया, उसके बदले में उन्हें सिर्फ छत का साया और बच्चों का प्यार ही मिल जाये। लेकिन दुर्भाग्यवश उसी से वो महरूम रहते है और परिवार के अन्दर का माहौल सुख शान्ति कलेश में तब्दील हो जाता है।
दरअसल, एकाकी परिवार वहां होते है, जहां पर घर की संतानें अपने-अपने कामों के लिये शहर के अन्य स्थानों में जाकर रहते हैं फिर वहीं पर अपना घर भी बना लेते हैं। ऐसे में उन्हें जो माहौल मिलता है, वो अलग-अलग सोच के लोगों का मिला-जुला असर होता है। जिसमें फंसकर इंसान अपने दायित्व का निर्वहन करने में अक्षम हो जाता है। लोगों का शायद ये भी मानना हो सकता है कि अपने माता पिता की उपेक्षा में उनके बेटे से ज्यादा उनकी पत्नियां जिम्मेदार हैं। लेकिन जो सर्वे रिपोर्ट आई है, उसमें सबसे ज्यादा प्रतिशत बेटों का है। जो अपने माता-पिता के सपने को उनकी आकांक्षाओं उनकी महत्वाकांक्षाओं को पूरा न कर पाने के लिये कसूरवार ठहराये गये हैं।
पहले के वक्त में एक परिवार के अन्दर कम से कम 20 से 30 लोग हुआ करते थे। घर के अन्दर साझा चूल्हा जला करता था। घर का हर सदस्य घर के काम-काज में बराबर का हाथ बंटाता था। सारी दिनचर्या हंसी-खुशी बीत जाती थी। घर के मुखिया के आदेशों का पालन करना सभी का धर्म हुआ करता था। घर के अन्दर किसी भी बात को लेकर अनबन देखने को नहीं मिलती थी। किसी भी काम को करने के लिये घर के मुखिया की अनुमति लेना अनिवार्य होता था। मुखिया की अनुमति मिलने के बाद ही उस काम की रूपरेखा तैयार की जाती थी।
कहने का तात्पर्य ये है कि घर के सदस्यों में किसी बात को लेकर किसी प्रकार का मतभेद नहीं होता था। लेकिन जब से संयुक्त परिवार एकल परिवार में तब्दील हुये हैं, उसके बाद से एक बहुत बड़ा परिवर्तन देखने को मिला है। क्योंकि एकाकी परिवार में एक स्वतंत्र माहौल का समावेश हो जाता है, जो संयुक्त परिवार में देखने को नहीं मिलता था। एकाकी परिवार में कुछ परिवार ऐसे भी होते हैं, जिनमें पति-पत्नि दोनों ही कार्य करते हैं। ऐसे में शाम को थके हारे घर आने के बाद उन्हें इतना वक्त नहीं मिलता कि वो जान पायें बाहर क्या हो रहा है।
माता-पिता की अनुपस्थिति में घर में रहने वाले बच्चे भी दिन भर मोबाईल या फिर कमप्यूटर पर अपनी उंगली घुमाकर दिन बिता देते हैं। वो क्या देख रहे हैं, किसी को नहीं मालूम लेकिन जैसा देखते हैं, वैसा ही अपने जीवन की दिनचर्या में उतार लेते हैं। लिहाजा उनके दिलो दिमाग पर पूरी तरह से पाश्चात्य रंग सवार हो जाता है, जिसमें उनके अन्दर आदर सत्कार की भावना नहीं रह जाती है। ऐसे में उन्हें अपने बुजुर्गों का किस तरह से ख्याल रखना है, उनकी सोच से परे रहता है।
क्योंकि बड़े बुजुर्ग युवा पीढ़ी के विचारों से अपना तालमेल नहीं बैठा पाते। इसलिए उनके हर कामों पर वे अपना एतराज जताते हैं, जिसके कारण बच्चे उन्हें नकार देते हैं। जिससे उनके स्वभाव में चिड़चिड़ापन आ जाता है, जो घर में असंतोष का कारण बनता है। लिहाजा ऐसे माहौल में न तो बुजुर्ग और न ही उनके बच्चे आपस में तालमेल बैठा पाते हैं। नतीजा ये होता है कि वो अपने बुजुर्गों की उपस्थिति नहीं चाहते। अब ऐसे माहौल में दोनो ही मानसिक तनाव के शिकार हो जाते हैं।
यही मानसिक तनाव उनके अन्दर फैसला करने की ताकत को कम कर देता है। आज देश के ज्यादातर शहरों के ओल्ड ऐज होम ऐसे ही आबाद नहीं हैं, वो इसी का परिणाम हैं। इन ओल्ड ऐज होम में कुछ तो ऐसे हैं, जो अपने आत्मसम्मान और खुद्दारी की वजह से वहां चले आते हैं और कुछ वो होते हैं, जिनके परिवार के सदस्य अपनी जिम्मेदारी से अपना किनारा करके अपने बुजुर्गों को यहां पहुचा देते हैं।
भले ही खुद्दारी की वजह से या फिर मजबूरीवश इन ओल्ड ऐज होम को आबाद करने वाले बुजुर्ग सारी टेंशन से दूर रहते हों, लेकिन आज की पाश्चात्य शैली और भागमभाग के जीवन ने हमारे बुजुर्गों को हमसे विरक्त जरूर किया है। उनकी आशाओं, अपेक्षाओं और उनके आदर भाव को पूरा न करके वास्तव में हमने अपने नैतिक मूल्यों को खोया है। यही वजह है कि आज हम अपने संस्कार खो रहे हैं। नतीजा यह हुआ कि हम अपने जीवन में जिस तरह का उतार-चढ़ाव महसूस करते हैं वो इसी का परिणाम है।

Prem

Prem

Sud-Editor

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

%d bloggers like this: