लो जी! तुम भी आज़ाद और हम भी ‘आज़ाद‘

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सलीम रज़ा :- हम कई दशक पहले से सुनते चले आ रहे थे कि कलयुग में वे सारे काम होंगे जिसे समाज में हिकारत की नज़रों से देखा जाता है।लेकिन आज इस घोर कलयुग में शर्म को भी शर्मसार करने वाले हादसे एक के बाद एक होते चले जा रहे हैं और हम आज भी अपने वेद पुराणों का हवाला देकर नई परपाटी और नई प्रथा को नकार रहे है।ं अब इस युग में वो सब होने वाला है जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं करी होगी। इस नई परिपाटी और प्रथा को मजबूरन न चाहते हुये भी हमें अपनी मौन स्वीकृति देनी ही पड़ेगी क्योंकि अब न तो राम जैसे पुरूष हैं और न सीता जैसी स्त्री हो सकती है । मेरा कहने का तात्पर्य ये नहीं है कि हर पुरूष और हर महिला को एक ही नजर से देखा जायें लेकिन आज के इस आधुनिक टेक्नोलाजी के युग में इंसान के अन्दर से अगर कोई चीज धीरे-धीरे विलुप्त हो रही है तो वो है लज्जा। कहते हैं लज्जा ही स्त्री का गहना है अगर ये गहना जिस्म से उतर जाये तो समाज में उसे किस नजर से देखा जाता है ये सब ही जानते हैं। शर्म ही ऐसी चीज है जो इंसान का वजन बढ़ाती है। लेकिन जब इंसान के अन्दर से लज्जा निकल जाती है आंखों से हया का पानी ढ़ल जाता है तो उसके अन्दर बेशर्मी का वायरस ट्रांसप्लान्ट हो जाता है जिसका इलाज असंभव है। हम कई दशक पीछे चले जाये तो उस दौर के लोगों के अन्दर एक दूसरे के प्रति आदर भाव था नारी के प्रति इज्जत थी कुछ एक अपवाद को छोड़ दे तो व्यभिचार न के बराबर ही था। पति पत्नि का बन्धन ऐसा बन्धन होता है जिसमें समर्पण प्यार और आदर का पूर्ण समावेश होता है एक दूसरे के प्रति विश्वास होता है लेकिन धीरे-धीरे वक्त ने करवट बदली इंसान के अन्दर स्वार्थ की भावना जागने लगी रिश्तों में विश्वास की कमी आई हैं आज के दौर में पति-पत्नी के संबन्धों में अब उस यकीन मजबूती समर्पण और प्यार का अभाव नजर आने लगा। यहां मै बात कर रहा हूं धारा 497 की सर्वोच्च न्यायालय ने जब से इस धारा को खत्म करने का ऐलान किया है जिसे देखो इस बिषय पर बहस करने से नहीं थक रहा है। हर आदमी के अन्दर जिज्ञासा इस बात की है क्या पति-पत्नि के संबध इस कदर कमजोर हो गये क्या अब व्यभिचार इस कदर फैल गया है क्या पति-पत्नि में विश्वास का अभाव है जो अदालत को इस धारा को संविधान से खत्म करने की जरूरत पड़ गई। क्या आप को लगता है इस धारा के खत्म हो जाने मात्र से व्यभिचार अत्याचार घरेलू हिंसा के मामलों में कमी आयेगी मेरी समझ से तो ऐसा संभव नहीं होगा। विवाहेत्तर संबधों के मामलों में ऐसे कई मामले सामने आये हैं जिसमें पति की हत्या के साथ-साथ सास ससुर की हत्या के मामले आये दिन अखबारों की सुर्खियां बने रहते हैंै यहां तक की ऐसे संबधों के चलते कई किस्से सामने आये हैं जिसमें मां ने अपने बच्चे को भी मौत के घाट उतार दिया है। ये जबकि बात है जब संविधान से धारा 497 खत्म नहीं हुई थी लेकिन अब चूंकि ये धारा संविधान से अलविदा हो चुकी है ऐसे में इन मामलों में इजाफा होना लाजिमी है । यहां एक बात बता देना जरूरी कि स्वच्छंद विचारों की मानसिकता रखने वाला एक बहुत बड़ा समाज इस धारा के खत्म होने से प्रभावित होगाा। हिन्दुस्तान के अन्दर एक बहुत बड़ा तबका ऐसा भी रहता है जो मानसिक संकीर्णता के तहत अपना जीवन यापन करता है ऐसे में इस धारा के खत्म होने से व्यभिचार के मामले और ज्यादा सामने आयेंगे साथ ही अदालत में तलाक के मामलों में इजाफा होगा साथ ही इससे सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे वों अविवाहित लोग जिन्होंने इसी परिवेश में जन्म लिया है।दरअसल पति-पत्नि का रिश्ता यकीन के धागे से बंधा होता है और इस धागे में गांठ पड़ जाये तो उसे सुलझाना संभव ही नहीं नामुमकिन भी है।क्योंकि जब इस यकीन की बुनियाद ही खोखली हो जायेगी फिर रिश्तों की पाकीज़गी अपने आप ही खत्म हो जायेगी। ये बताना शायद जरूरी भी नहीं समझता लेकिन कहना उचित भी है कि पति-पत्नि के रिश्ते विश्वास की बुनियाद पर मज़बूती से टिके रहते हैं यही विश्वास की बुनियाद अगर कमजोर हो जाये तो परिवार में छिटकाव शुरू हो जाता है घर में कलह जन्म ले लेती है क्योंकि पति-पत्नि की आत्यधिक व्यस्तताओं के चलते एक दूसरे पर निगाह रख पाना असंभव है लेकिन जिस तरह से सर्वोच्च न्यायालय ने इस धारा को खत्म करके स्त्री को समान अधिकार भले ही देने की कोशिश करी है लेकिन मुझे ये बात कहने में जरा भी संकोच नहीं है कि अदालत ने व्यभिचार के दरवाजे खोल दिये हैं परिणाम ये होगा जिसमें नारी की दशा और दिशा पहले के मुकाबले बद से बदत्तर होने के संकेत हैं।

Prem

Prem

Sud-Editor

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