मीटू बनाम चारित्रिक नुमाईश…

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सलीम रज़ा पुरूषो के लिये साल के बकाया ये दो महीने शुभ बीतते नहीं दिख रहे हैं और शायद आने वाला नया साल भी अच्छा गुजर जाये तो फिलहाल इस बारे में अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन जिस तरह का मीटू नाम का जिन्न बोतल से बाहर निकला है, उसने पूरे पुरूष समाज को अपने विकराल और सशक्त पंजों में दबोच लिया है। जिसके दर्द से पूरा पुरूष समाज आहत जरूर दिखाई दे रहा है।
हर पुरूष एक अनजानी आशंका से ग्रसित जरूर दिख रहा है कि न जाने कब और कैसे इस मीटू जैसे संक्रमण की जद में आ जाये। बहरहाल इस धरती पर पुरूष ही ऐसा जीव है, जो अपने भूतकाल को कभी याद नहीं रखता और भविष्य के भावी सपने बुनने में ज्यादा यकीन रखता है। हां इन पुरूषों के मुकाबले स्त्री जाति अपने भूतकाल को ज्यादा याद रखती हैं, ये उनकी फितरत है। अक्सर आपने देखा होगा कि जब चार महिलायें एक जगह पर जमा हों तो भविष्य की कम भूतकाल की बातें करती ज्यादा पाई जाती हैं।
यह ही वजह है कि वो अपने भूतकाल को ध्यान में रखकर अपने भविष्य का ताना बाना बुनती हैं। मुझे याद आती है गांधी जी की पुस्तक मेरे सपनों का भारत जिसमें उन्होंने लिखा था कि पाश्चातय संस्कृति की नकल हमारे देश के लिये घातक होगी। उन्होंने ये भी लिखा है कि एशिया के लोग पाश्चात्य सभ्यता और संस्कृति की नकल करने में माहिर होते हैं। उनका ये कथन सौ फीसदी सही है। हमारा देश सचमुच संस्कृति और सभ्यता की नकल करने में प्रथम स्थान पर हैं। ये जो मी टू अभियान है, इसी का परिचायक है।
दरअसल मीटू अभियान की शुरूआत करीब एक साल पहले अमेरिका के हाॅलीवुड स्टार के खिलाफ यौन शोषण का एक मामला था। जिसमें उनके ऊपर एक के बाद एक कई महिलाओं ने अरोप लगाये थे। जिसमें अदालत को मजबूरन उस अभिनेता के खिलाफ मुकदमा दर्ज करना पड़ा था। उसी से ग्रसित होकर हिन्दुस्तान में चलाया जा रहा मीटू अभियान है। जिसमें वो सेलीब्रिटी हैं, जिन्होंने अपने जीवन के कड़वे अनुभव को मेहनत की चासनी में डुबोकर सबके सामने एक मिसाल के रूप में पेश किया।
जिसको हम सीढ़ी दर सीढ़ी तरक्की की पायदान चढ़ता हुआ व्यक्तित्व कहते हंै। अब तो ये बात स्पष्ट हो ही रही है कि मीटू अभियान में अभी तक जो मामले सामने आये हैं, वो ऐसी सेलीब्रिटी के खिलाफ हैं। जो आज तरक्की के शिखर पर खड़े हैं। मेरे लिखने का मतलब यह नहीं कि मैं नारी समाज के इस कैम्पेन से सहानभूति नहीं रखता हूं। मेरे अन्दर भी पीड़ा है, मैं महिलाओं के साथ हुये किसी भी दुवर््यवहार से आहत हूं। लेकिन उसके संदर्भ में चन्द सवाल मेरे मन में कौंध रहे हैं, उसको लेकर मेरा मन इस मीटू कैम्पेन को लेकर शंकित अवश्य है।
हमारे देश में रोज किसी न किसी प्रदेश के जिले ब्लाॅक तहसील या गांव से अबोध बच्चियों के साथ दुष्कर्म की घटनायें पढ़ने को मिलती हैं। हाल ये है कि मौजूदा वक्त में 10 बच्चियों में से 4 बच्चियों के साथ ऐसी घटना रोज घटती है। लेकिन इसके लिए तो महिलाओं का कोई कैम्पेन दिखाई नहीं देता क्या इस मीटू कैम्पेन में उन दबी-कुचली निर्बल असहाय बच्चियों की पीड़ा दबकर रह जाती है। क्या ये मातृ शक्ति का फर्ज नहीं है कि वो उनके लिये भी खुलकर बढ़-चढ़ कर कैम्पेन चलाये और उसमें अपनी हिस्सेदारी सुनिश्चित करें।
क्योंकि कोई भी औरत अपनी कोख पर हमला वरदाश्त नहीं करती, फिर यहां इस तरह का भेदभाव क्यों। सवाल ये उठता है कि क्या अपने उपर हुये अत्याचार के लिये कोई भी महिला किसी सही वक्त का इन्तजार करेगी। हो सकता है सही वक्त आने में 1 से लेकर 10 साल तक लग सकते हैं। क्या उसके बाद भी उसके साथ हुये अत्याचार दुव्र्यवहार की अदालत सुनवाई करेगी।अगर ऐसा है तो फिर ताजे मामले अदालत में लंबित क्यों पड़े रहते हैं। सोशल मीडिया पर चलाया जा रहा ये कैम्पेन पूरी तरह से राजनीतिक नजर आता है।
जिसमें सच्चाई कुछ भी हो लेकिन कहीं ऐसा तो नहीं अपनी उम्र के उस पड़ाव पर, जहां महिला अपने आप को असुरक्षित महसूस करती है। क्या ये मीटू कैम्पेन उस असुरक्षा को सुरक्षित करने का फंडा तो नहीं है। बहरहाल, हो कुछ भी लेकिन ये कैम्पेन भले ही महिलाओं की अस्मिता से जुड़ा बहस का विषय हो, लेकिन उससे कहीं ज्यादा नारी समाज के अपमान का विषय है। क्योंकि जो बात कोई जानता ही नहीं है, उसे एक लम्बे अर्से बाद पूरी दुनिया के सामने रखकर सस्ती लोकप्रियता बटोरने का हथियार मात्र है।
अगर नहीं चला तो सड़क के किनारे बिकने वाला साहित्य और अगर चल गया तो एक क्लासिक नोवेल जरूर होगा। अगर उस वक्त जब उस महिला के साथ यौन शोषण हुआ, उस वक्त उस महिला को अपने साथ हुये यौन शोषण की बात अपने परिवार के बीच रखने में लाज आई थी। फिर इतने सालों के बाद ऐसा कौन सा लाज का पर्दा छलनी हो गया, जो अपने साथ हुये इस कृत्य को पूरी दुनिया के सामने रखने और उस पर बहस कराने की आवश्यकता इन महिलाओं को आन पड़ी।
दरअसल, यौन शोषण के बढ़ती घटनाओं को देखते हुये लिमिटेशन एक्ट बनाया गया था, जो सन् 2013 को आस्तित्व में आया था। जिसमें धारा 354-ए पार्ट 2 और 3, जिसमें महिला पर यौन संबन्धी टिप्पणी अशोभनीय व्यवहार पोर्न फिल्म दिखाने के लिये थी। धारा 354-बी महिला को निवस्त्र करने उसकी मर्जी के वगैर सम्पर्क करने और पीछा करने जैसे मामले आते हैं। अब सबसे बड़ा प्रश्न ये उठता है कि क्या अध्यादेश बनने के पहले महिलाओं के साथ हुये यौन शोषण के मामलों में अदालत इन महिलाओं को न्याय देगी।
वहीं विधि विशेषज्ञों का कहना है कि अध्यादेश आने से पहले के जो मामले हैं, उनकी सुनवाई नहीं की जा सकती। अगर हम विधि विशेषज्ञों की बात सामने रखते हैं तो जो कैम्पेन इस वक्त चलाया जा रहा है, उसमें दम दिखाई नहीं दे रहा है। हां ये बात अलग है कि जैसे हमारी माननीय मंत्री मेनिका गांधी ने संविधान बनाने की पैरवी जरूर की है। लेकिन संविधान बनाने के लिये भी कड़े इम्तिहान से गुजरना होगा। वाह रे… हमारा हिन्दुस्तान, ये कैम्पेन उस वक्त सामने आया, जब महिलाओं को समान अधिकार देने की मंशा से संविधान में धारा 497 को ही खत्म कर दिया गया।
बहरहाल, चुनावी बयार की भीनी-भीनी खुश्बू आ रही है। ऐसे में इस तरह की चलाई जाने वाली कोई भी मुहिम सियासी वायरस से ग्रसित है। अगर इसमें सच्चाई है तो इस कैम्पेन की भुक्त-भोगी महिलाओं का सत्य जानने के लिये पीछे जाना होगा। ये पता लगाना होगा कि यौन शोषण का शिकार हुई महिला का चारित्रिक इतिहास क्या है। उसकी माली हालत अब कैसी है और उसके परिवार की पृष्ठभूमि क्या रही है, इसका पूरी तरह से सत्यापन होना चाहिए। अगर सत्यापन में निकलकर आता है कि सचमुच अमुक महिला का शोषण हुआ है और उसमें संलिप्त पुरूष ने उसकी असिमता के साथ खिलवाड़ किया है तो वो एक संगीन अपराध की श्रेणी में आता है।
अततः इतना जरूर है कि सिर्फ महिला की शिकायत मात्र से पुरूष के खिलाफ लामबन्द हो जाना, अस्वस्थ लोकतं़त्र और लचर कानून व्यवस्था का परिचायक है। अगर पुरूष पर लगाये गये आरोप सिद्ध नहीं होते हैं तो आरोप लगाने वाली महिला दण्ड की भागीदार होगी। बहरहाल, इस कैमपेन को भले ही सहानभूति मिल रही हो या इस कैम्पेन को महिलाओं का भरपूर समर्थन मिल रहा हो, लेकिन जिस हाल में ये चल रहा है, उसमें सियासी बू जरूर आ रही है।

Prem

Prem

Sud-Editor

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