मोदी जी, चाय में मीठा कम है….

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राज शेखर भट्टह :- हमारे देशवासियों ने अनेक प्रकार की चाय पी हुयी हैं। जैसे कि… दूध वाली चाय, नींबू वाली चाय, काली चाय, तुलसी चाय, ग्रीन चाय। वहीं दूसरी ओर हमारे राजनेताओं ने भी देसवासियों को अनेकों प्रकार की चाय पिलाई हैं। जैसे कि घोषणा वाली चाय, वादों वाली चाय, इरादों वाली चाय और भाषण वाली चाय। वैसे भी भाषण वाली चाय का स्वाद तो भारतवासियों को पता ही होगा। क्योंकि प्रधानमंत्री बनते ही मोदी जी ने कपड़े बदल-बदलकर खूब भाषण वाली चाय हम लोगों को पिलायी है और इस चाय का स्वाद तो युवाओं ने उछल-उछल कर लिया है।

बहरहाल, ऐसी चाय तो हमने तब भी पी, जब हम यूपी में थे और अब भी पी रहे हैं, जब उत्तराखण्ड में हैं। लेकिन मानने वाली बात तो यह है कि वादों, इरादों, घोषणा और भाषण वाली चाय पी-पीकर लोग ऊबे नहीं हैं, बस पीते ही जा रहे हैं। वैसे भी घोषणा और वादों वाली चाय तो अधिकतर चुनाव के आस-पास ही पिलायी जाती है और लोगों के चेहरे पर होती है मुस्कान। दरअसल, 2019 में लोकसभा का किचन खुलना है और वोटों की खिचड़ी पकनी है, तो खिचड़ी से पहले चाय पीना तो जरूरी है ना।

खैर, अब मुद्दे पर आते हैं और जो अब मोदी जी उत्तराखण्ड वासियों को चाय पिला रहे हैं, उसकी बात करते हैं। क्योंकि लोकसभा का किचन भी खुलना है और 5 साल किचन को संभालना भी है, तो ऐसी चाय पिलाना तो लाजमी है। जब किचन में रसाईये बढ़ जायं तो मजा ही कुछ और है। मोदी जी की इस चाय में पानी राजनाथ जी का, चायपत्ती अंबानी जी की, दूध अडानी जी का और चूल्हा मोदी साहब का, लेकिन चीनी कम है चाय में…? आखिर चीनी कम क्यों है, इसका भी कारण है, जो जल्द ही पता चल जाएगा।

अभी हाल ही में मोदी साहब उत्तराखण्ड आए और 37 मिनट तक भाषणों की स्वादहीन चाय पिलाते रहे। चुनाव नजदीक हैं तो उत्तराखण्ड की याद आई और घोषणाओं का पिटारा खोल दिया। अरे बाबा, 4 साल तक तो नोटबंदी, जीएसटी, आधार कार्ड, कालाधन, अगैरा-वगैरा में ही अटके हुये थे। जब जरूरत आन पड़ी है तो ही इनको इको जोन, ऋषि मुनि की तपस्या, गंगा मां का आशीर्वाद और समिट के वादों को जल्द धरातल पर दिखाने की बात याद आती है।

मोदी जी के भी क्या कहने…! कहते हैं कि उत्तराखण्ड के 18 साल बेहद महत्वपूर्ण हैं। इन 18 सालों में भाजपा के 5 मुख्यमंत्री गद्दी में चढ़-उतर चुके हैं। एक स्थाई राजधानी तो दे न पाये, क्या यही है 18 महत्वपूर्ण साल। मोदी जी को 2025 में उत्तराखण्ड की रजत जयंती मनानी है। अरे साहब जी, अस्थाई राजधानी के साथ ही रजत जयंती मनाओगे क्या। मोदी जी की चाय में मीठा कम लगने के कारण तो बेशुमार है, लेकिन मोदी साहब तो अपनी बातों से ही बता देते है कि चाय में मीठा कम क्यों है। जैसा कि मोदी साहब ने कहा कि उत्तराखण्ड पूरे देश को सामर्थवान बना सकता है, उत्तराखण्ड देश को न्यू इंडिया बना सकता है। मोदी साहब को यह तो पता ही होगा कि एक हाथ से ताली नहीं बजा सकते।

साहब जी का भी क्या कहना…! भारत को वल्र्ड ग्रोथ का इंजन बनाने की बात करते हैं। 1947 से अब तक तो विकसित तो हुआ नहीं, ग्रोथ का इंजन बनाओगे। पाश्चात्य सभ्यता, संस्ड्डति, नियम और कानून को अपना रहे हैं, ग्रोथ का इंजन बनाओगे। ग्रोथ का इंजन तब बन सकता है, जब जापान की तरह दो परमाणु बम के विस्फोटों के बाद भी देश को जल्दी से कवरअप करके विकसित की श्रेणी में ला पाओ।

चलो साहब, ग्रोथ इंजन तो ये लोग बना ही लेंगे, लेकिन थोड़ा सा भूत की भी सुन लें, क्योंकि भविष्य तो लड़खड़ा रहा है। मोदी साहब के कुर्सी पर बैठने से पहले की चाय थी ‘हर हाथ को मिलेगा काम’। अरे जरा बता तो दो किसको मिला काम, कहां घटी बेरोजगारी, कितना बढ़ गया रोजगार। कपड़े बदलने और विदेशों की सैर करने से रोजगार नहीं बढ़ता। हमारे देश की नींव और आत्मा है हमारी मुद्रा, उसको डाॅलर कुचल रहा है और राजनेता टुकर-टुकर एक दूसरे को देख रहे हैं।

सुनने में कितना सुखद लगता था कि ‘बहुत हुआ किसानों पर अत्याचार, अबकी बार मोदी सरकार’। लेकिन वर्तमान में भी क्या खाक अच्छा हुआ, किसानों पर अत्याचार अब भी हो रहा है और मोदी जी भाषणों की चाय पिलाने में लगे हुये हैं। मेक इन इंडिया, डिजीटल इंडिया बोलने से धरती में स्वर्ग नहीं उतर सकता है। भ्रष्टाचार रोकना है, कालाधन वापस लाना है, विकास करना है। लेकिन कहना और करना, दोनों अलग-अलग रास्ते हैं। इसीलिए सत्य कथन है कि ‘‘कथणी मीठी खाण सी, करनी विष की लोय। कथणी तज करनी करें, विषहु अमृत होय।’’

भाषण की चाय की बात करते हैं तो आभास होता है कि इस चाय का स्वाद बेहद ही निर्मल, सुखद और स्वादिष्ट होगा। लेकिन यह केवल आभास ही है दोस्तों, सच्चाई नहीं। मोदी साहब द्वारा उत्तराखण्ड आकर चाय में मसाला डाला गया। मसालानुसार, ‘‘भारत के पास विश्व का नेतृत्व करने की क्षमता है और महंगाई पर नियंत्रण है।’’ बहुत सुन्दर…! अपनी मुद्रा को बचा पा नहीं रहे हो, करलो विश्व का नेतृत्व। 90 प्रतिशत साग-सब्जी 60-80 रूपये किलो चल रही है, सारी दालों का मूल्य लगभग 200 रूपये किलो है, पैट्रोल 80 से ऊपर है। क्या ऐसे हो रहा है महंगाई पर नियंत्रण।

सभी को पता है कि करोड़ों का मैमोरेण्डम आॅफ अण्डरस्टेंडिंग बन चुका है, लेकिन अण्डस्टेंडिंग कितनी है और स्टेंडिंग कितनी, राम जाने। गुप्त सूत्रों ने बताया है कि डेढ़ लाख लोगों को रोजगार मिलने की संभावना है। ज्यादा खुशी की बात नहीं है ये, क्योंकि संभावना है, पक्का कुछ नहीं। ऐसी संभावना तो कब से सुनते आ रहे हैं। जैसे कि, यहां पर्यटन में अपार संभावना है, कृषि के क्षेत्र में संभावना है, विद्युत आपूर्ति की संभावना है, महंगाई कम होने की संभावना है लेकिन इतना जरूर है कि बस संभावना है।

कनेक्टिविटी के प्रयास किये जा रहे हैं, पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा। ये होगा, ऐसा होगा, ऐसा हो सकता है, संभावना है, घटेगा, बढ़ेगा, कोशिश कर रहे हैं, ऐसा बनेगा, आदि-आदि। लेकिन चाय में मिठास तब आएगी, जब चाय पीने वाले स्वयं बोलने लगें कि ये हो चुका है, रोजगार बढ़ चुका है, महंगाई घट चुकी है और विकास हो चुका है। चाय पीने वालों की तरफ से बनाने वालों को एक सुझाव… ‘‘विकास जब घोड़ी चढ़ेगा तब पता चलेगा कि चाय में डाले गये दूध में कितना पानी है और कितना दूध और कितनी मिठास है। चाय में भी मिठास तब ही आती है मोदी जी, जब धरातल पर कुछ दिखने लगे। घोषणाओं के पिटारे और भाषणों के मायाजाल से विकास नहीं होता साहब।

Prem

Prem

Sud-Editor

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