[राजनीती का रण] छत्तीसगढ़ का कौन होगा खेवईया और कौन होगा सबसे बड़ा लड़ईया?

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छत्तीसगढ़ में नवंबर तक चुनाव होने की घोषणा हो सकती है और जिसके परिणाम स्वरुप सभी राजनीतिक दलों ने अपनी तैयारियाँ शुरू कर दी हैं साथ ही छत्तीसगढ़ के तमाम नेता, 2018 के विधानसभा चुनाव की रणभूमि में रणविजय प्राप्त करने के लिए अपनी कमर कस चुके हैं। कोई सोशल मीडिया का सहारा ले रहा है, तो कोई मीडिया मैनेजमेंट के लिए एजेंसियों से संपर्क कर रहा है, कोई जन संवाद में लगा है तो कोई लोक लुभावने वादे करने के लिए शपथ पत्र जारी कर रहा है लेकिन कुछ पार्टियां तंत्र मंत्र का सहारा लेने के लिए भी पूरा जोर लगा रही हैं। एक तरफ जहां भारतीय जनता पार्टी का 15 साल का शासनकाल है तो दूसरी तो एंटीइनकम्बेंसी भी एक बहुत बड़ा फैक्टर है। राजनीतिक दिलचस्पी है कि यह विधानसभा चुनाव दो दलों के बीच नहीं बल्कि 3 से ज्यादा दलों के बीच होने जा रहा है क्योंकि 2016 में कांग्रेस से अलग हुए छत्तीसगढ़ के प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने भी अपनी पार्टी जनता काँग्रेस छत्तीसगढ़ (जे) की स्थापना की है और साथ ही दिल्ली की सत्ता में काबिज आम आदमी पार्टी भी इस वर्ष छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव में अपना दम कम दिखाने की तैयारी में है।
अब बात करें भारतीय जनता पार्टी की तो उनके सामने 15 साल के शासन काल में हुए असंतोष जो कि लोगों में बहुतायत संख्या में व्याप्त है, उसका सामना करना पड़ेगा और साथ ही नए चेहरों को टिकट देने और पुराने और वर्तमान मंत्रियों तथा विधायकों को मनाने की भी चुनौती भाजपा के सामने आने वाली है। मुख्यमंत्री के चेहरे को लेकर भी खींचतान थी खबरें आ रही हैं।
अब बात करते हैं कांग्रेस पार्टी की तो कांग्रेस पार्टी में गुटबाजी और नेतृत्व के प्रति उदासीन तथा संगठन में साफ दिखाई देती है। 15 साल से सत्ता से बाहर रहने वाली छत्तीसगढ़ काँग्रेस आज भी नेतृत्व के लिए संघर्ष करती दिखाई दे रही है और कई बार प्रदेश प्रभारियों के बदले जाने के बावजूद कांग्रेस की स्थिति जस की तस बरकरार है। पिछले वर्ष बी. के. हरिप्रसाद की जगह कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता एवं राज्यसभा सांसद पन्नालाल पुनिया को छत्तीसगढ़ कांग्रेस कमेटी का प्रभारी नियुक्त किया गया था जिसे आज एक वर्ष पूर्ण हो चुके हैं। शुरुआती दौर में लगा कि श्री पूनिया के आने के बाद कांग्रेस में एक नई ऊर्जा का संचार हुआ और दिखाई भी वही देने लगा था लेकिन समय के साथ-साथ संगठन में असंतोष और गुटबाजी की खबरें उभर कर सामने आने लगीं। कई बार जिलाध्यक्षों और कई पदों की नियुक्तियों में लेन-देन की खबरें भी मीडिया के माध्यम से सामने आईं, कई बार कुछ ऐसे नेताओं का भी विरोध सामने आया जिनको कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष के द्वारा कांग्रेस में वापसी करवाई गई थी लेकिन प्रदेश अध्यक्ष के सामने ना किसी की चल पाई ना ही किसी की चल रही है लेकिन वर्तमान की स्थिति पर आगर ध्यान दें तो पार्टी का संगठन अंदर ही अंदर खोखला होता जा रहा है और कमजोर दिखाई दे रहा है। तो क्या विधानसभा चुनाव 2018 के तीन माह पूर्व कांग्रेस के पास ऐसा कोई चमत्कारिक विकल्प है कि वह 15 साल बाद कांग्रेस संगठन को एकजुट करते हुए सत्ता में वापसी करे और कार्यकर्ताओं को उत्साहित कर उनके जोश को बरकरार रख पाए? साथ ही फरवरी मार्च 2018 के आसपास, विधानसभा चुनाव के मद्देनजर जो कुछ नई समितियां बनी थीं उनकी गतिविधियां भी दिखाई नहीं दे रही हैं, तो क्या इसकी पीछे भी कोई असंतोष है या फिर कुछ और? आखिर कांग्रेस पार्टी की इस परिस्थिति का जिम्मेदार कौन है? दिल्ली में बैठे आला कमान, प्रदेश के प्रभारी या फिर पार्टी के प्रदेश के मुखिया! अब ये तो कांग्रेस पार्टी को ही सोचना होगा लेकिन अगर यही स्थिति रही तो यह निश्चित है कि इस बार भी कांग्रेस पार्टी के साथ वही गति होगी जो पिछले तीन चुनाव में होती आई है। जानकारों की माने तो कांग्रेस पार्टी के लिए यह अंतिम अवसर है क्योंकि छत्तीसगढ़ में अब 15 साल के बाद भी कांग्रेस पार्टी सत्ता में नहीं आ पाई तो दुबारा आने में शायद कई वर्ष लग जाएं।

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