रामकथा कही राम के आगे

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तृतीय वर्ष संघ शिक्षा वर्ग के समापन समारोह के दौरान पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का संबोधन सुन कर रामायण का लव-कुश प्रसंग स्मरण हो आया। रामदरबार में लव-कुश के पुष्पकमल मुखों से मुखरित हो रही रामकथा से स्वयं भगवान श्रीराम भी परिचित थे, उनके परिजन व दरबार में उपस्थित उनके सहयोगी भी लेकिन उस समय सभी लोग रामकथा का आनंद लेते दिखे। संघ समारोह में प्रणब दा ने जिस तरह विविधता में एकता, बाहुल्यवादी संस्कृति, राष्ट्रवाद, सहिष्णुता का संदेश दिया, वह इस देश की मानसिकता के साथ-साथ संघ के विचारों से भी हूबहू मेल खाता दिखा।
कुछ मुद्दों पर तो प्रणब मुखर्जी व सरसंघचालक मोहन भागवत एक सुर में ही बोलते दिखाई दिए। दोनों ने माना कि विरोधी विचारों के बीच भी संवाद होना जरूरी है। संवाद से ही जटिल समस्याओं का हल निकल सकता है और देश आगे जा सकता है। आशा है कि इन दो महापुरूषों के मार्गदर्शन के इस संबोधन के बाद देश में वर्तमान में कटुता के घोड़े पर सवार राजनीति व वैचारिकी पर थोड़ी लगाम अवश्य लगेगी।
पूर्व राष्ट्रपति ने बहुप्रतीक्षित भाषण में कहा कि भारत की आत्मा बहुलतावाद व उदारता में बसती है। हमारे समाज में यह सदियों से चले आ रहे तमाम विचारों के मिलन से आई है। सेक्युलरिज्म व सर्वसमावेशी विचार हमारी आस्था के विषय हैं। इस मिश्रित संस्कृति के कारण ही हम एक राष्ट्र बन सके हैं। हिंदूू एक उदार धर्म है। राष्ट्रवाद किसी धर्म व भाषा में बंटा हुआ नहीं है। सहनशीलता हमारी ताकत है। हमारा राष्ट्रवाद कोई एक भाषा, एक धर्म या एक शत्रु से पैदा नहीं हुआ, यह तो सवा अरब लोगों की सदाबहार सार्वभौमिकता का परिणाम है जो दैनिक जीवन में 122 भाषाएं इस्तेमाल करते हैं। जब यहां आर्य, मंगोल और द्रविड़ सभ्यताओं के लोग एक झंडे के नीचे भारतीय बनकर रहते हैं और कोई किसी का शत्रु नहीं होता, तब हमारा भारत एक राष्ट्र बनता है।
संविधान से राष्ट्रवाद की भावना बहती है। विविधता व सहिष्णुता में ही भारत बसता है। संवाद न सिर्फ विरोधी विचारों के बीच संतुलन बनाने के लिए बल्कि सामंजस्य बैठाने के लिए भी जरूरी होता है। हम आपस में बहस कर सकते हैं। हम सहमत हो सकते हैं, नहीं भी हो सकते लेकिन विचारों की बहुतायत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
उन्होंने कहा कि जब भी किसी बच्चे या महिला के साथ बर्बरतापूर्ण व्यवहार होता है तो भारत की आत्मा घायल होती है। क्रोध जताने के विभिन्न तरीकों से हमारे सामाजिक ढांचे को क्षति पहुंच रही है। हम रोज अपने इर्द-गिर्द हिंसा बढ़ते देख रहे हैं। हमें अपने समाज को हर प्रकार की हिंसा से दूर रखना चाहिए चाहे वह शारीरिक हो, या शाब्दिक। सिर्फ अहिंसात्मक समाज से ही लोकतंत्र में सभी वर्गों, खासतौर से वंचितों व पिछड़ों की भागीदारी सुनिश्चित की जा सकती है। सात धर्म, 122 भाषाएं, 16०० बोलियों के बावजूद सवा अरब भारतीयों की पहचान एक है। सरदार पटेल ने 565 रियासतों को एक किया तो नेहरू जी ने भारत एक खोज में राष्ट्रवाद की नई परिभाषा बताई।
इससे पूर्व संघ के सरसंघचालक डा. मोहन भागवत द्वारा व्यक्त किए गए विचारों का सारांश भी लगभग यही था कि हमारा समाज बहुलतावादी संस्कृति, विविधता में एकता, वसुधैव कुटुंबकम, सर्वे भवंतु सुखिनरू सर्वेसंतु निरामया के सिद्धांतों पर टिका है। इसमें शारीरिक व वैचारिक हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं हो सकता।
दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि वर्तमान की राजनीति, सामाजिकता व बौद्धिकता इन विचारों के विपरीत खड़ी दिखाई देने लगी हैं। यह वैचारिक असहिष्णुता का ही परिणाम है कि कुछ राजनेता व बुद्धिजीवी प्रणब मुखर्जी को संघ के कार्यक्रम में जाने से ही रोकते रहे। केवल इतना ही नहीं, जब वे नहीं रुकते दिखे तो कईयों ने उनके खिलाफ ही अभद्र भाषा का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। वर्तमान युग की सबसे बड़ी विसंगति यह है कि चाहे राजनेता हों या लेखक या मीडिया कर्मी या कोई और, सभी अपने आप को सर्वज्ञ व सर्वगुण संपन्न मान कर चलते दिख रहे हैं।
हर कोई इसी अंधविश्वास का शिकार है कि वह जो कह रहा है या सोच रहा है वही अंतिम सत्य है। जिसमें मेरा लाभ, वही बात ठीक और नुक्सान हुआ तो वह गलत। इसी सोच के चलते वाणी में कर्कशता, भाषा में असभ्यता के साथ मिथ्यावचन और व्यवहार में हिंसा का समावेश हो रहा है। टीवी चर्चाओं में चीखते चिल्लाते प्रस्तोता, हृदयभेदी शब्दबाण छोड़ते नेता व प्रवक्ता, आंदोलन के नाम पर पथराव व आगजनी करती भीड़, गाली गलौज से भरा सोशल मीडिया आदि सभी बातें इसका प्रमाण है कि आज हमारा लोकतंत्र पूर्णत: स्वस्थ हालत में नहीं है।
आज की ही बात नहीं, अपने जीवन काल से ही संघ वैचारिक असहिष्णुता का शिकार होता आया है। यह बात अलग है कि संघ की बढ़ रही लोकप्रियता व सर्व वर्ग स्वीकार्यता ने विरोधियों को इसके प्रति और अधिक आक्रामक कर दिया। देश में होने वाली किसी भी दुर्घटना या अपराध पर बिना हिचक व लोकलाज की चिंता किए संघ का नाम घसीट लिया जाता है। संघ को अछूत बनाने की पूरी कोशिश की जाती रही है परंतु प्रणब मुखर्जी के साहसपूर्ण कदम से इस बात की संभावना बनी है कि देश में संवाद के लिए नया वातावरण तैयार होने वाला है। इसका स्वागत किया जाना चाहिए।
प्रणब दा ने संघ संस्थापक डा. केशव बलिराम हेडगेवार को भारत माता का महान सपूत बताते हुए उनके खिलाफ दुष्प्रचार करने वालों का मुंह हमेशा के लिए बंद कर दिया है। पूरी रामकथा से अब मंथराओं व सीता को उलाहना देने वाले धोबी वाली मानसिकता के लोगों को समझ जाना चाहिए कि अब उनका समय लदने वाला है।

Anil Anup

Anil Anup

राज्य ब्यूरो प्रभारी पंजाब, हिमाचल, हरियाणा और जम्मू-कश्मीर l

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