शराब, कबाब और नोट =वोट

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राजशेखर भट्ट:- वाह री राजनीति… क्या दिया तूने। वाह रे राजनेता… क्या किया तूने। वाह रे मतदाता… तू भी ऐसा होगा, पता नहीं था। कुल मिलकर सिर्फ इतना है कि राजनीति कुत्सित हो चुकी है, चाहे वह निकाय हो, विधानसभा हो या लोकसभा।

क्या चुनाव लड़ना यही होता है? क्या चुनाव प्रचार के लिए हर उम्मीद्वार को इतना पैसा चुनाव आयोग देता है। जिसमें कि बेहिसाब प्रचार, लोगों को जमा करने का खर्चा, खिलाना-पिलाना पूरा सिमट जाता होगा। खैर, कोई नयी बात तो नहीं है। किसको पता कि चुनाव में एक उम्मीद्वार कितना खर्च करता है और एक मतदाता कितना कमाता है। यूं भी कहा जा सकता है कि बिक चुका मतदाता। कुछ मत कट्टरपंथी के भाव गये तो कुछ जातिवाद की भेंट चढ़े। कुछ मत शान में गये तो कुछ मत नशे की आड़ में गायब हो गये। कुछ मत झूठी घोषणाओं के पल्ले पड़ गये तो कुछ नोट के बल पर खरीद लिए गये। कुछ मत कबाब में लिपट चले तो कुछ डरा-धमका के अपने पक्ष में कर लिये गये।
बहरहाल, किसी से दुश्मनी तो नहीं है मेरी परन्तु अनेक चुनावी दौरों के दौरान देखी गयी चीजों को ही साझा कर रहा हूं। चुनावी प्रचार चल रहा है तो प्रत्याशियों के द्वारा जगह-जगह पर चावल और मीठ-मुर्गा खिलाया जा रहा है। बच्चे, युवा और हर जाति-धर्म के व्यक्ति चुनावी दारू का स्वाद ले रहे हैं। दारू पीकर वर्तमान पीढ़ी के युवा तो अपना भविष्य गर्त में डाल ही रहे हैं और छोटी उम्र के बच्चे भी इस से अछूते नहीं रहे। सुनने में यह भी आता कि शराब नशे में दुर्घटनायें भी हुयीं। प्रचार करने वालों में लड़ाई झगड़े का माहौल होने से भगदड़ मच गयी।
मजे की बात प्रचार करने के लिए भी लोगों को खरीदा जा रहा है। मतदाता के एक दिन प्रचार में जाने का फायदा भी लाखों में एक है। क्योंकि दिन भर प्रचार में रहो, भोजन में मिलेगा चिकन-मटन और शाम को 500 का एक नोट। लेकिन मतदाता अपने वर्तमान को देखता है, न कि भविष्य को। क्योंकि 5 साल तक तो उसे चिकन-मटन और 500 का नोट मिलेगा नहीं। यह भी हो सकता है कि चुनाव जीतने वाला प्रत्याशी भी जनता की नजरों में खरा उतरने के लिए कुछ अच्छा काम करे। अब अंत में इतना ही कहा जा सकता है कि चुनाव आयोग को ऐसे चुनावी प्रचार पर अंकुश लगाने के लिए ठोस कदम उठना चाहिए।

‘‘हमारा तो रोजगार ही खतम हो गया’’
हा…हा…हा… ये बात मैं नहीं कह रहा हूं। क्योंकि कई बार चुनाव के दौरान युवाओं और महिलाओं को ऐसा मजाक करते हुये सुना गया है कि ‘‘अब तो चुनाव भी खतम हो जायेंगे, पांच साल तक का हमारा रोजगार और खाना-पीना भी खतम हो जाएगा। हंसी की बात तो युवाओं की इस बात से आई कि ’’कोई बात नहीं यार, अभी लोकसभा के चुनाव भी नजदीक हैं, तो मिल जायेगा हमें रोजगार।’’

Prem

Prem

Sud-Editor

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