भगोड़े  पर कैसा भरोसा ?? 

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गौरतलब है कि माल्या 3 मार्च, 2016 को चोरी-छिपे लंदन भाग गया था। उसके बाद अब 13 सितंबर, 2018 को पुनिया को अचानक याद आया है कि जेतली और माल्या की मुलाकात हुई थी…
-अनिल अनूप 

विजय माल्या भारत के लिए ‘आर्थिक भगोड़ा’ है। यानी कानूनन एक अपराधी..! उसने 17 राष्ट्रीयकृत बैंकों के 9000 करोड़ रुपए डकार रखे हैं। उसके प्रत्यर्पण के फैसले की तारीख 10 दिसंबर तय हो चुकी है। उस दिन ब्रिटिश अदालत फैसला देगी कि उसे भारत को सौंपा जा सकता है या नहीं। भारत और ब्रिटेन के बीच की प्रत्यर्पण संधि बेहद पेचीदा और कठिन है। इस दौरान माल्या का दावा सामने आया है कि उसने संसद में वित्त मंत्री अरुण जेतली से मुलाकात की थी और बैंकों से सेटलमेंट का प्रस्ताव पेश किया था। इस संदर्भ में वित्त मंत्री जेतली का स्पष्टीकरण आया है और विपक्षी कांग्रेस ने ‘मिलीभगत’ और माल्या को विदेश भगाने की साजिश का आरोप लगाते हुए वित्त मंत्री का इस्तीफा मांगा है। कांग्रेस का दावा है कि उसके नेता-सांसद पीएल पुनिया ने बजट सत्र के दौरान 1 मार्च को संसद के सेंट्रल हॉल में दोनों की मुलाकात देखी। मुलाकात करीब 15-20 मिनट तक चली। गौरतलब है कि माल्या 3 मार्च, 2016 को चोरी-छिपे लंदन भाग गया था। उसके बाद अब 13 सितंबर, 2018 को पुनिया को अचानक याद आया है कि जेतली और माल्या की मुलाकात हुई थी। इस दौरान माल्या के खिलाफ आपराधिक केस जारी रहा है। फरवरी 2017 में अदालत ने माल्या को ‘भगोड़ा’ घोषित किया था। सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) लगातार जांच कर रहे हैं, नतीजतन माल्या की 14,000 करोड़ रुपए की संपत्तियां जब्त की गई हैं। दरअसल जिन्होंने संसद की कार्यवाही कवर की है और सेंट्रल हॉल तक जाने की मान्यता हासिल है, वे जानते हैं कि वहां कितनी अनौपचारिक मुलाकातें होती रही हैं। मंत्रियों और सांसदों के साथ पत्रकारों की भी ‘ऑफ द रिकॉर्ड’ बातचीत खूब होती रहती हैं। लोकतंत्र की यह भी एक परंपरा है। क्या सेंट्रल हॉल में जेतली-माल्या की मुलाकात और बातचीत (यदि हुई है तो ) को अधिकृत और औपचारिक माना जा सकता है? क्या अढ़ाई साल पहले के सीसीटीवी कैमरे यह भी खुलासा कर सकेंगे कि दोनों के बीच क्या संवाद हुआ था? हमारा तो यह सुझाव है कि संसद की अथारिटी तब के सीसीटीवी के साक्ष्यों को सार्वजनिक करे। सब कुछ बेनकाब हो जाएगा, यदि साक्ष्य आज भी मौजूद होंगे। लेकिन इन साक्ष्यों में आवाज की बात करना हास्यास्पद है। संभव है कि संसद के सीसीटीवी कुछ विशेष प्रकार के होंगे! बहरहाल सबसे महत्त्वपूर्ण सवाल तो यह है कि हम एक ‘आर्थिक भगोड़े’ के दावों पर भरोसा क्यों और कैसे करें? माल्या 2016 के उस कालखंड में राज्यसभा सांसद थे। वित्त मंत्री और भगोड़े की मुलाकात से महत्त्वपूर्ण यह है कि आखिर किंगफिशर कंपनी का तत्कालीन अध्यक्ष माल्या देश के सभी बड़े बैंकों के 9000 करोड़ रुपए कैसे डकार गया? बैंक तो 100 रुपए कर्ज के बदले एक आम आदमी की इज्जत नीलाम कर देते हैं। फिर बैंकों के ऋण 9000 करोड़ रुपए तक कैसे पहुंच गए? डिफाल्टर होते रहने के बावजूद बैंक माल्या के कर्ज का पुनर्गठन क्यों करते रहे और करोड़ों रुपए कैसे और क्यों मुहैया कराते रहे? मौजूदा सरकार को विस्तार से वे तथ्य और आंकड़े सार्वजनिक करने चाहिए। वैसे इस संदर्भ में तत्कालीन प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह और वित्त मंत्री चिदंबरम को लिखे माल्या के पत्र पूरी हकीकत बयां कर देते हैं। वे पत्र सार्वजनिक चर्चा में हैं और नवंबर, 2011 का पूर्व प्रधानमंत्री का कथन भी बहुत कुछ स्पष्ट कर देता है। दरअसल 2010-11 के दौरान के सरकारी पत्रों और फोन कॉल्स की भी जांच होनी चाहिए। सवाल ये हैं कि माल्या का बुनियादी मेहरबान कौन है? किंगफिशर कंपनी में गांधी परिवार की क्या हिस्सेदारी थी और दोनों पक्ष इतना करीब क्यों थे? राहुल गांधी अब माल्या के खुलासों को सच किस आधार पर मान रहे हैं? क्या संसद के गलियारे में मंत्री और सांसद का मिलना गैर-कानूनी है? क्या माल्या ने तब वित्त मंत्री जेतली को सेटलमेंट का कोई लिखित प्रस्ताव दिया था? इन सभी सवालों को नए सिरे से खंगालना चाहिए, लेकिन दो तथ्य स्पष्ट होने चाहिए। एक, माल्या ने लंदन जाने का कोई भी जिक्र वित्त मंत्री से नहीं किया था। दूसरा, जब तक गैर जमानती वारंट जारी न हों, तब तक लुक आउट नोटिस भी जारी नहीं किया जा सकता। यह सर्वोच्च न्यायालय का फैसला है। फिर भी माल्या के विदेश भागने पर मोदी सरकार को ही जवाब देना होगा कि अब भगोड़ा वापस भारत कैसे लाया जा सकेगा और उसे जेल की सलाखों के पीछे ठूंसा जा सकेगा? यह प्रकरण बैंकों में बढ़ते एनपीए का भी खुलासा करता है। उद्योगों को किस हद तक और किस स्तर पर बेलआउट किया जाए, यह सवाल भी चर्चा में आ गया है।

Anil Anup

Anil Anup

राज्य ब्यूरो प्रभारी पंजाब, हिमाचल, हरियाणा और जम्मू-कश्मीर l

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