आखिर हम कौन है ?

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वैधानिक चेतावनी
इस पोस्ट को पढ़ने से पहले ध्यान दें
आप अपना मानसिक संतुलन खो सकते हैं और आपका खोया हुआ मानसिक संतुलन आपको उस तथ्य से मिला सकता है जो हमेशा आपके साथ ही था लेकिन आप अपने संतुलित मानसिकता की वजह से उससे कभी मिल नहीं पायें. पोस्ट पूरा पढ़ने के बाद यदि आप असंतुलित होते हैं तो इसमें लेखक की कोई जिम्मेदारी नहीं है. इस पोस्ट को अपनी जवाबदेही में पढ़ें.

संतोष “प्यासा”

रुक जाओ, थोड़ा ठहरो, एक गहरी साँस लो. जिस समय आप ये लेख पढ़ रहें है ठीक उसी समय आपके आस-पास कोई बहुत ज्यादा दुखी और विचलित है तो कोई आनंद चित्त. अब आप कोशिश करो कि इस समय आपके मन में जो भी विचार आ रहे है वो थम जाएँ. फिर एक गहरी साँस लो अब मन ही मन अपना नाम लो. अब जब आप अपना नाम ले रहें है तो इस समय आप अपने जहन सिर्फ खुद कि छवि ही पा रहें है. आप बस आप हैं, अभी तक आपके मन में सिर्फ खुद के बारे में ही विचार आया है. इस समय आपके मन में आपके नाम के अलावा आपके धर्म या जाति कि छवि नहीं आयी. लेकिन जब यहाँ आपने धर्म या जाति शब्द पढ़ा तो अब आपके मन में आपका धर्म और आपकी जाति से सम्बंधित विचार आ गएँ.
अब फिर एक बार गहरी साँस लीजिये अपनी ऑंखें बंद करिये और सोंचिये कि अभी आपने जो अपना नाम लिया, आपने जाति और धर्म के बारे महसूस किया, क्या यही सत्य है ? क्या यही आपकी पहचान है ? क्या आप वहीँ हैं जो खुद के बारे में आप सोंचते हैं ?
नहीं, जो आपका नाम है वो आपने नहीं चुना, न ही आपने अपने धर्म व् जाति को चुना है. जन्म होने बाद आपको एक नाम दिया गया, एक धर्म, एक कुल या वर्ग दिया गया और इसके बाद आप अपनी पूरी जिंदगी इसी फिक्शनल (कल्पित) आइडेंटिटी (पहचान) की हिफाजत में लग जाते हैं.
आप इसी फिक्शनल आइडेंटिटी के लिए आक्रामक भी हो उठते हैं और भावुक भी. अब जरा सोंचिये कि आप जो नहीं हैं उस आइडेंटिटी के लिए यदि आप भावुक और आक्रामक हो सकतें है तो जो आपका असली वजूद है उसके लिए आपको किस हद तक भावुक और आक्रामक हो सकतें है?
एक और गहरी साँस लीजिये और मन में आ रहे सारे विचारों को अविरल रूप से बहने दीजिये.
अब आप पूछेंगे की जब हमारा नाम और धर्म यानि हमारी आइडेंटिटी ही फिक्शनल है तो क्या हमें इसे बदलना चाहिए ? हमारी रियल आइडेंटिटी क्या ?
नहीं हमें अपनी इस फिक्शनल आइडेंटिटी (जिसे कि हम अपनी रियल आइडेंटिटी मान चुके है) को बदलने कि कोई जरुरत नहीं है. न मैंने अपना फिक्शनल आइडेंटिटी बदला और न ही आप बदलिए.
अब आपके मन एक विचार आएगा कि यदि हमें अपनी इस फिक्शनल आइडेंटिटी को बदलना ही नहीं है तो हम इस पर बात क्यों कर रहें है.
तो दर-असल मुद्दे वाली बात ये है कि आज के समय में आप हम इसी फिक्शनल आइडेंटिटी के सम्मोहन में इतना ज्यादा खो गए हैं कि हम अपनी रियल (वास्तविक) पहचान का नुकसान कर रहें है.
हमारी और आपकी रियल आइडेंटिटी ह्यूमन है (मानव) है. लेकिन फिक्शनल आइडेंटिटी के सम्मोहन में आकर हम एक दूसरे से कभी धर्म के नाम पर तो कभी जाति के नाम पर तो कभी वर्ग के नाम झगड़ते हैं. यहाँ तक कि हम इस झूठी पहचान के लिए कत्ले आम करने से भी नहीं चूकते.
हमें और आपको बस इतना करना है कि इस फिक्शनल आइडेंटिटी पर गुरुर करना छोड़ना है. फिक्शनल आइडेंटिटी के वर्चस्व के लिए एक दूसरे के साथ मानसिक रूप से कोई मतभेद नहीं पालना है.
आप वो नहीं है जो आपकी फिक्शनल आइडेंटिटी है, और न वो जिसे आप धर्म या जाति के नाम पर झगड़ते या नफरत करते हैं. दर-असल वो भी इसी फिक्शनल आइडेंटिटी का हिस्सा है. असल में हम सब कि सिर्फ एक ही आइडेंटिटी है और वो है ह्यूमैनिटी (मानवता).

नोट ये पोस्ट पढ़ने के बाद या तो आप बिलकुल शांत हो चुकें है या फिर आप ये सोंच रहें है कि क्या चू#[email protected]पा है. 
सार्थक तर्क आमंत्रित हैं

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